नई दिल्लीः भारत ने पश्चिम एशिया में शत्रुता समाप्त करने को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) का स्वागत किया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा कि यह समझौता वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती देगा और महत्वपूर्ण वस्तुओं तथा उर्वरकों की आपूर्ति शृंखला में आ रही बाधाओं को दूर करने में मदद करेगा। उन्होंने इस समझौते को सावधानीपूर्ण आशावाद के साथ सकारात्मक कदम बताया।
होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण
ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक को संबोधित करते हुए डोभाल ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद स्वागतयोग्य घटनाक्रम है। इससे आपूर्ति शृंखलामें मौजूद रुकावटें कम होंगी और उर्वरक तथा रसायन जैसे क्षेत्रों में संभावित कमी की समस्या से भी राहत मिलेगी।
नई दिल्ली में आयोजित हुई ब्रिक्स देशों की अहम बैठक
ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की यह बैठक नई दिल्ली में आयोजित की गई। भारत वर्तमान में ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता कर रहा है, इसलिए इस महत्वपूर्ण सम्मेलन की मेजबानी भी भारत ने की।
बैठक की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने की। इसमें चीन के विदेश मंत्री वांग यी, रूस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सर्गेई शोइगु, ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के उप सचिव गादिर नेजामीपोर तथा ब्रिक्स देशों के अन्य वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी शामिल हुए।
वैश्विक चुनौतियों से निपटने में ब्रिक्स की भूमिका पर जोर
अपने उद्घाटन संबोधन में डोभाल ने कहा कि दुनिया इस समय अत्यंत उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रही है। भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, आर्थिक दबावों और तेजी से विकसित हो रही प्रौद्योगिकियों ने नई चुनौतियां पैदा कर दी हैं। केवल खतरे ही नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि संघर्षों को रोकने और हल करने के लिए मौजूद संस्थागत तंत्र भी कई मामलों में अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। ऐसे समय में ब्रिक्स की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
बहुपक्षवाद में गिरावट पर जताई चिंता
डोभाल ने कहा कि बहुपक्षवाद लगातार कमजोर पड़ रहा है और वैश्विक स्तर पर सहयोग की भावना को नई ऊर्जा देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों को मिलकर यह विचार करना चाहिए कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में यह समूह किस प्रकार सकारात्मक और प्रभावी भूमिका निभा सकता है। दुनिया तेजी से बदल रही है और संघर्ष समाधान के पारंपरिक साधन अपनी प्रभावशीलता खोते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में ब्रिक्स देशों के सामने विशेष जिम्मेदारी है।
शांति, विकास और सहयोग का प्रतीक है ब्रिक्स
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा कि ब्रिक्स की स्थापना उभरती अर्थव्यवस्थाओं के एक अनौपचारिक समूह के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य अधिक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देना था। साथ ही यह समूह आर्थिक सहयोग को मजबूत करने और वैश्विक दक्षिण की आवाज को सशक्त बनाने के लिए बनाया गया था। ब्रिक्स वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और संस्थागत बदलावों की भी वकालत करता रहा है। उनके अनुसार यह समूह शांति, प्रगति, विकास और सहयोग में विश्वास रखने वाले देशों का एक विशिष्ट मंच है।
दुनिया के 11 प्रमुख उभरते देशों का समूह है ब्रिक्स
ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी। वर्ष 2024 में इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को शामिल किया गया। इसके बाद वर्ष 2025 में इंडोनेशिया भी इस समूह का सदस्य बन गया। आज ब्रिक्स दुनिया की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जो वैश्विक आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का करीब 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है।
आतंकवाद और नई सुरक्षा चुनौतियों पर भी होगी चर्चा
डोभाल ने बताया कि सम्मेलन में आतंकवाद-रोधी सहयोग से जुड़े ब्रिक्स के दो संयुक्त कार्य समूहों की रिपोर्ट और उपलब्धियों पर भी चर्चा की जाएगी। दुनिया को नई सुरक्षा चुनौतियों के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है। गैर-पारंपरिक खतरे राष्ट्रीय सीमाओं से आगे निकल चुके हैं और वे पारंपरिक सुरक्षा प्रणालियों को चुनौती दे रहे हैं।
उभरती प्रौद्योगिकियों से पैदा हो रहे जोखिमों का जिक्र
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा कि विघटनकारी प्रौद्योगिकियों से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियां भी तेजी से बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि ये सभी खतरे वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं और सामूहिक विचार-विमर्श के माध्यम से इनके समाधान तलाशने की आवश्यकता है।
ईरानी प्रतिनिधि ने इन देशों पर लगाये आरोप
बैठक के दौरान ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के उप सचिव गादिर नेजामीपोर ने मीनाब शहर के एक विद्यालय पर हुए हमले में मारे गए बच्चों का पोस्टर प्रदर्शित किया। उन्होंने दावा किया कि ईरान के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई अमेरिका और इजराइल द्वारा शुरू की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े संकट और ईरान पर हमलों के पीछे अमेरिका और इजराइल की भूमिका रही। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ हमले संयुक्त अरब अमीरात की धरती पर स्थित ठिकानों से किए गए थे। गादिर नेजामीपोर ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात ने इन कार्रवाइयों की निंदा करने के बजाय अपनी भूमि का उपयोग ईरान के नागरिक ढांचे, स्कूलों और अस्पतालों पर हमले के लिए किए जाने की अनुमति दी। उन्होंने कहा कि इस कारण संयुक्त अरब अमीरात भी इस आक्रामकता का हिस्सा बना।