क्या प्रसव के बाद होने वाला अवसाद केवल माताओं तक ही सीमित है? हाल के अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि बच्चे के जन्म के बाद पिता भी मानसिक अवसाद का सामना कर सकते हैं।
आमतौर पर शिशु के जन्म के बाद मां का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। उनकी दिनचर्या बच्चे के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाती है। नींद की कमी होने लगती है और शरीर में हार्मोनल बदलाव स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना देते हैं। हालांकि यह समस्या केवल माताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पिता भी इसी तरह के मानसिक दबाव से गुजर सकते हैं।
JAMA Network Open में प्रकाशित एक अध्ययन में 10 लाख से अधिक नए पिताओं को शामिल किया गया। इस शोध में यह सामने आया कि पिता सबसे अधिक मानसिक तनाव का सामना बच्चे के जन्म के लगभग एक वर्ष बाद करते हैं। जब बच्चा करीब एक वर्ष का होता है, उसी समय पिता के तनाव का स्तर लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
इसी प्रकार शिकागो विश्वविद्यालय के शोध में भी पाया गया कि लगभग 13 से 18 प्रतिशत पुरुष बच्चे के जन्म के बाद अवसाद से प्रभावित होते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में वे अपनी इस स्थिति को पहचान नहीं पाते।
विशेषज्ञों के अनुसार पुरुषों में इस समस्या को पैतृक पोस्टपार्टम डिप्रेशन या पीपीडी कहा जाता है। यह स्थिति लगभग हर दस में से एक पिता को प्रभावित कर सकती है और आमतौर पर बच्चे के जन्म के तीन से छह महीने के भीतर इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यदि मां भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन से गुजर रही हो, तो इसका प्रभाव पिता पर भी पड़ता है और ऐसे में उनके प्रभावित होने की संभावना लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
इस समस्या के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे लगातार नींद की कमी, आर्थिक दबाव, परिवार की बढ़ती जिम्मेदारियां, या बच्चे और जीवनसाथी के साथ भावनात्मक दूरी महसूस करना। जिन लोगों को पहले से अवसाद की समस्या रही हो, उनमें इसका जोखिम और बढ़ सकता है।
इसके लक्षणों में लगातार चिड़चिड़ापन, गुस्सा या झुंझलाहट, परिवार और मित्रों से दूरी बनाना, अचानक आक्रामक व्यवहार करना और साथ ही सिरदर्द, पेट से जुड़ी दिक्कतें या शरीर में दर्द जैसी शारीरिक समस्याएं शामिल हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी पिता में ऐसे संकेत दिखाई दें, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते चिकित्सकीय या मनोवैज्ञानिक सहायता लेना जरूरी है, ताकि स्थिति को गंभीर होने से रोका जा सके।