पटनाः बिहार की राजनीति में इन दिनों तेज हलचल देखी जा रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद अब उनके विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देने की प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित हो गया है। जनता दल (यू) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने संकेत दिया है कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत यह कदम जल्द उठाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि संविधान के अनुसार किसी भी राज्य विधायिका के सदस्य को संसद के लिए चुने जाने के बाद 14 दिनों के भीतर अपनी पुरानी सदस्यता छोड़नी होती है। इसी के चलते मुख्यमंत्री द्वारा 30 मार्च तक इस्तीफा देने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का विकल्प
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की जा रही है। संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने भी छह महीने तक मुख्यमंत्री पद पर बना रह सकता है। ग्रामीण विकास मंत्री शरवन कुमार ने भी इस बात की पुष्टि की है कि नीतीश कुमार के पास यह विकल्प मौजूद है।
लंबे राजनीतिक कार्यकाल का अहम मोड़
नीतीश कुमार का नाम बिहार की राजनीति में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल है। वर्ष 2005 से शुरू हुआ उनका कार्यकाल कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच लगातार जारी रहा। नवंबर 2025 में उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। अब राज्यसभा में उनकी एंट्री को उनके इस लंबे कार्यकाल के संभावित अंत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
कानून-व्यवस्था पर सियासी टकराव
राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। संजय झा का दावा है कि बिहार में कानून-व्यवस्था देश में सबसे बेहतर है और अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की जाती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में हत्या, डकैती और दंगा जैसे मामलों में कमी दर्ज की गई है और बड़ी संख्या में आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है। राज्य को नक्सल प्रभाव से मुक्त होने का दावा भी किया गया है।
दूसरी ओर, विपक्षी नेता तेजस्वी यादव इन दावों को खारिज करते हुए कहते हैं कि राज्य में अपराध बढ़ रहे हैं और कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो चुकी है।
नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें तेज
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बिहार में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि राज्य में नई सरकार का गठन हो सकता है और इसमें भारतीय जनता पार्टी की भूमिका प्रमुख हो सकती है। हालांकि इस पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
संजय झा ने यह भी संकेत दिया है कि नीतीश कुमार संसद सत्र के दौरान दिल्ली में सक्रिय रहेंगे, जबकि पटना में रहकर पार्टी और सरकार को मार्गदर्शन देते रहेंगे।
प्रशासनिक प्राथमिकताएं और आगे की राह
राज्य सरकार प्रशासनिक स्तर पर अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा रही है। वर्ष 2026-27 के बजट में गृह विभाग के लिए 20,132 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसमें पुलिस बल को मजबूत करने, डिजिटल पुलिसिंग और महिला सुरक्षा पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ‘सुरक्षित सफर’ जैसी योजनाएं भी इसी दिशा में लागू हैं।
कुल मिलाकर, नीतीश कुमार का राज्यसभा में जाना बिहार की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे रहा है। आने वाले दिनों में उनके इस्तीफे और संभावित राजनीतिक बदलाव के साथ राज्य की सियासी दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।