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बॉडी शेमिंग के खिलाफ जागरूकता जरूरी, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करें

बच्चों के आत्मबल को बढ़ाने के लिए जरूरी है कि वे खुद को स्वीकार करें और सकारात्मक सोच अपनाएं।

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Feb 26, 2026 19:23 IST

बॉडी शेमिंग का अर्थ है किसी व्यक्ति के शरीर के आकार, वजन या बनावट पर नकारात्मक टिप्पणी करना। यह सिर्फ मोटापे या दुबलेपन तक सीमित नहीं है। शरीर के किसी भी अंग के लिए अपमानजनक टिप्पणी या मजाक बॉडी शेमिंग के अंतर्गत आता है। यह आलोचना परिवार, दोस्तों, स्कूल के साथियों या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी हो सकती है। कई बार यह जानबूझकर नहीं, बल्कि अनजाने में की जाती है।

सोशल मीडिया और डिजिटल प्रभाव

सोशल मीडिया बॉडी शेमिंग को और बढ़ावा देता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक या टिकटॉक पर आदर्श शरीर की छवियों को देखकर बच्चे अपनी तुलना करते हैं। यह अवास्तविक अपेक्षाए पैदा करता है और आत्मसम्मान को कमजोर करता है। ऑनलाइन अपमान या ट्रोलिंग, जिसे साइबरबुलिंग कहा जाता है, भी इस समस्या का हिस्सा है।

बच्चों और युवाओं पर प्रभाव

स्कूल और कॉलेज के छात्र अक्सर मोटापा, हाइट, रंग, आवाज या पहनावे को लेकर ताने सुनते हैं। यह मजाक में किया जाए या गंभीर तौर पर, इसका असर गहरा होता है। छोटे बच्चों एवं छात्रों पर प्रभाव अधिक पड़ता है, वे आत्मविश्वास खो देते हैं, पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते, अकेलापन महसूस करते हैं और कभी-कभी स्कूल छोड़ने तक का विचार करते हैं। कई सरकारी और निजी स्कूलों में काउंसलर उपलब्ध नहीं होते हैं या बच्चों को उनकी भूमिका और सहायता के बारे में जानकारी नहीं होती।

यह बॉडी शेमिंग अक्सर क्लासमेट्स, सीनियर स्टूडेंट्स, कभी-कभी शिक्षक और घर के लोग भी करते हैं। यह मजाक के नाम पर भी हो सकता है, लेकिन प्रभाव स्थायी होता है। कई छात्रों को वजन, कद या शरीर की बनावट पर मजाक और तानें, मानसिक रूप से प्रभावित करते हैं।

आत्मबल बढ़ाने के उपाय

बच्चों के आत्मबल को बढ़ाने के लिए जरूरी है कि वे खुद को स्वीकार करें और सकारात्मक सोच अपनाएं। माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों को समझाना चाहिए कि शरीर की विविधताएं सामान्य हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना, नियमित संवाद, आत्म-सम्मान और योग या खेल गतिविधियों में भाग लेना मददगार हो सकता है। बच्चों को यह भी सिखाना चाहिए कि वे किसी भी बॉडी शेमिंग की घटना की शिकायत स्कूल काउंसलर, अभिभावक या हेल्पलाइन के माध्यम से करें।

बच्चों को इस विषय पर शिक्षित करना जरूरी है ताकि वे इस तरह की मानसिक पीड़ा से बच सकें और दूसरों के प्रति सहानुभूति और सम्मान विकसित कर सकें।

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