गुस्सा, दुख, अभिमान ये सभी भावनाएं कभी-कभी बहुत तीव्र हो जाती हैं। समझने की शक्ति खो जाती है। उस समय समझ नहीं आता कि कैसा व्यवहार करना चाहिए। कई बार ऐसा व्यवहार कर बैठते हैं कि बाद में पछतावे की कोई सीमा नहीं रहती। इसलिए जीवन की कुछ परिस्थितियों में चुप रहना ही बेहतर होता है। लेकिन कब? किस समय खुद को संभालने के लिए चुप रहना चाहिए?
गुस्सा होने पर
किसी बात पर किसी के प्रति गुस्सा आए तो चुप हो जाएं। कई बार गुस्से का प्रदर्शन बहुत भयानक हो सकता है। गुस्से में ऐसी बातें कह देते हैं, जो शायद नहीं कहनी चाहिए। बाद में पछताने से बेहतर है कि चुप रहें। जब गुस्सा शांत हो जाए, तब शांत मन से बैठकर स्थिति का आकलन करें। उसके बाद निर्णय लें।
सच सुनना हो तो
कभी-कभी ऐसी घटना हो सकती है जिसे आप स्वीकार नहीं कर पा रहे हों। लेकिन सच जानना आपके लिए जरूरी होता है। हो सकता है आप उस स्थिति के साथ खुद को ढाल नहीं पा रहे हों और इसी कारण चिल्ला उठें। ऐसा नहीं करना चाहिए। सच जानने के लिए धैर्य से बैठना होगा और कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। इसके अलावा यदि आप किसी विषय में कुछ नहीं जानते, तब भी चुप रहना बेहतर है।
झगड़े के दौरान
झगड़ा और तनाव हर प्रकार के रिश्तों में होते हैं। लेकिन झगड़े के समय मुंह से ऐसी बात नहीं निकलनी चाहिए जो सामने वाले के मन को चोट पहुंचाए। कई बार स्थिति हाथ से निकल जाती है। दोनों तरफ से तीखी बहस से मामला और जटिल हो जाता है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए खुद को संभालें और चुप हो जाएं। बात का जवाब तुरंत बात से देने की कोशिश न करें।
आलोचना के समय
आलोचना का सामना हर व्यक्ति को कभी न कभी करना पड़ता है। लेकिन गुस्सा करना ठीक नहीं है। यदि आलोचना सुनने की क्षमता है तो अच्छा है। और यदि नहीं है, तो चुप रहना ही बेहतर है। गुस्से में दूसरों को दो कटु बातें कह देने से कोई लाभ नहीं होता। इससे आलोचना बंद नहीं होगी, बल्कि आपके बारे में नकारात्मक सोच और बढ़ेगी। इसलिए किसी की बात को ज्यादा महत्व न देकर चुप रहना ही बेहतर है।