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बच्चों के चिल्लाने-रोने और मांगों के तुरंत पूरा किए जानें वाली जिद? कैसे करें नियंत्रित?

अगर बचपन में हल्की-सी जिद पर भी बच्चे के हाथ में सब कुछ दे दिया जाए, तो वह समझने लगता है कि रोने और चिल्लाने से काम बन जाता है। यही आदत आगे चलकर अनियंत्रित मांगों में बदल जाती है। इसलिए अभिभावकों के लिए जरूरी है कि वे अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखें, स्पष्ट सीमाएं तय करें और सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना सीखें।

By सायम कृष्ण देव, Posted by : राखी मल्लिक

Feb 19, 2026 19:00 IST

सड़क, दुकान या किसी रिश्तेदार के घर कोई चीज देखते ही बच्चा उसे तुरंत पाने की जिद्द करता है। सामान का नाम सुनते ही, वह चाहिए। बचपन में कई बच्चों में ऐसी जिद देखी जाती है। और अगर न दी जाए तो चिल्लाना, रोना ऐसा अवज्ञाकारी व्यवहार कई माता-पिता को झेलना पड़ता है।

बचपन में इस बात को ज्यादा महत्व न दिया जाए, तो जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, समय के साथ यह आदत और भी परेशान करने वाली बन जाती है। इस समस्या को दूर करने के लिए मारपीट या डांट-फटकार करने से स्थिति और बिगड़ सकती है। इसलिए जब बच्चा किसी चीज के लिए जिद करता है, तो उसे संभालने के लिए धैर्य और योजना की जरूरत होती है।

दरअसल इस आदत के पीछे कहीं न कहीं अभिभावकों की भी भूमिका होती है। अगर बचपन में थोड़ी-सी जिद पर ही उसकी हर मांग पूरी कर दी जाए, तो बच्चा समझने लगता है कि रोने या चिल्लाने से काम बन जाता है। यही आगे चलकर अनियंत्रित मांगों में बदल जाता है। इसलिए माता-पिता को अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना, सीमाएं तय करना और सावधानी से प्रतिक्रिया देना सीखना जरूरी है।

ऐसे समय पर कैसे व्यवहार करें?

सबसे पहले यह समझ लें कि जिद या टैंट्रम छोटे बच्चों का स्वाभाविक व्यवहार है। यह उनकी भावनाओं और असंतोष की अभिव्यक्ति है। लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे और बच्चा यह सीख जाए कि रोने से चीज मिल जाती है, तो समस्या बढ़ जाती है। इसलिए हर बार उसकी मांग पूरी कर जिद शांत करने की आदत न डालें। इसके बजाय कुछ नियम अपनाएं।

उनका ध्यान भटकाएं

जिद शुरू होते ही उसका ध्यान किसी और तरफ मोड़ने की कोशिश करें। उसे कोई खिलौना दें, कहानी सुनाएं या अपने साथ कोई काम सिखाएं। छोटे बच्चों का ध्यान आसानी से बदला जा सकता है।

शांत रहें

अगर आप खुद शांत रहेंगे, तो बच्चे की भावनाएं भी धीरे-धीरे शांत होंगी। यदि आप गुस्सा करेंगे या चिल्लाएंगे, तो वह और अधिक जिद्दी हो सकता है।

‘ना’ कहने का तरीका सीखें

सिर्फ ‘ना’ कहना काफी नहीं है। उसे स्पष्ट और नरम भाषा में समझाएं कि अभी वह चीज क्यों नहीं दी जा सकती। अगर बच्चा महसूस करेगा कि आप उसकी भावनाओं को महत्व दे रहे हैं, तो वह समझने की कोशिश करेगा।

समय आने पर दें

यदि आपको लगता है कि वह चीज भविष्य में दी जा सकती है, तो धैर्य रखने की शर्त पर बाद में देने का वादा करें। इससे बच्चा इंतजार करना और किसी चीज को पाने का महत्व समझेगा।

याद रखें कि माता-पिता का काम सिर्फ बच्चों को चीजें देना नहीं है, बल्कि उन्हें सही शिक्षा देकर अच्छा इंसान बनाना है। अच्छा व्यवहार सिखाना ही उन्हें बड़ा करने की सबसे जरूरी सीख है।

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