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पढ़ाई ही पर्याप्त नहीं, बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखें?

बच्चों के मामले में Behavior is Communication” वास्तव में नाराजगी, गुस्सा, डर, शिकायत या अन्य सभी भावनाएँ जिन पर हम बड़े लोग चर्चा करते हैं, वे बच्चों की समझ से बाहर होती हैं।

By सायम कृष्ण देव, Posted by : राखी मल्लिक

Feb 15, 2026 18:44 IST

आपको गुस्सा आए तो आप क्या करते हैं? कोई कहेगा चिल्लाता हूं, कोई कहेगा बात करना बंद कर देता हूं या कुछ और। दुख होने पर? किसी से नाराजगी होने पर? किसी वजह से तकलीफ़ होने पर? कभी बहुत खुश होने पर? किसी चीज को दिल से पाने की इच्छा होने पर? हर व्यक्ति अपनी भावनाओं को अलग-अलग तरीके से व्यक्त करता है। लेकिन सबसे जरूरी है कि आप अपने मन की बात किसी से कह सकें। अपनी भावनाओं पर किसी के साथ चर्चा कर सकें।

दुख, तकलीफ और खुशी बांट सकें। इससे मन काफी हल्का हो जाता है। लेकिन जो इन भावनाओं के नाम ही सही तरह से नहीं जानते, वे क्या करेंगे? बात हो रही है बच्चों की। आजकल कई लोग बच्चों के जिद्दी स्वभाव को लेकर शिकायत करते हैं। बात न मानने पर उन्हें डांटते भी हैं। कभी-कभी गुस्से में दो-एक थप्पड़ भी मार देते हैं। लेकिन क्या कभी यह जानने की कोशिश की है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है?

शहर में एसपीके जैन फ्यूचरिस्टिक एकेडमी और अर्ली चाइल्डहुड एसोसिएशन के सहयोग से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर एक अधिवेशन आयोजित किया गया। वहीं यह महत्वपूर्ण विषय सामने आया। स्कूल जाने में अनिच्छा, अचानक किसी बात से डर जाना, स्कूल में चुपचाप रहना, किसी शिक्षक के प्रति अधिक आकर्षण, पढ़ाई में दूसरों जैसा कुशल न होना—ऐसी कई समस्याओं का सामना रोज शिक्षकों और अभिभावकों को करना पड़ता है। कई बार हम इन बातों पर गहराई से विचार नहीं करते या उन्हें अधिक महत्व नहीं देते। लेकिन मनोचिकित्सकों का मानना है कि इन्हें नजरअंदाज करना सबसे खतरनाक हो सकता है।

इस दिन अर्ली चाइल्डहुड एसोसिएशन की राष्ट्रीय समिति के सदस्य डॉ. सुमन सूद ने कहा कि असल में बच्चों के मामले में Behavior is Communication। यानी बच्चों का व्यवहार ही उनका संदेश होता है। नाराजगी, गुस्सा, डर, शिकायत—या अन्य भावनाएं जिन पर हम बड़े लोग चर्चा करते हैं, वे अक्सर बच्चों की समझ से बाहर होती हैं। अधिकांश मामलों में वे खुद भी नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं। फिर भी कोई घटना या बात उनके मन पर इस तरह असर डालती है कि वे असामान्य व्यवहार करने लगते हैं।

हो सकता है स्कूल में बुलीइंग का शिकार होना, तबीयत खराब होना या घर में देखी या घटी कोई घटना इसका कारण हो। ऐसे में डांटना नहीं, बल्कि शांत तरीके से समस्या का समाधान करने की कोशिश करनी चाहिए।

कैसे समझें कि कोई बच्चा किसी कारण से परेशान है?

मनोचिकित्सक माधुरी सारदा बताती हैं कि इस मामले में जैसे अभिभावकों को सतर्क रहना चाहिए, वैसे ही स्कूल की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। किसी छात्र के व्यवहार को देखकर शिक्षक को समझना चाहिए कि कहीं कोई समस्या तो नहीं। आवश्यकता पड़ने पर अलग से बात करनी चाहिए और अभिभावकों को भी इसकी जानकारी देनी चाहिए।

साथ ही बड़ों का व्यवहार भी बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चे मिट्टी की तरह होते हैं। वे जो देखते हैं, वही सीखते हैं। यदि किसी विषय पर स्कूल में कुछ और सिखाया जाए और घर में उसका उल्टा बताया जाए, तो बच्चे भ्रमित हो सकते हैं। इससे उनके भीतर विश्वास की कमी भी आ सकती है। जरूरत पड़ने पर काउंसलर की मदद लेनी चाहिए।

मनोचिकित्सक विधि बंसल कहती हैं कि बच्चों के दोस्त बनना होगा। याद रखें, कभी-कभी छोटी सी घटना भी बच्चों के मन पर गहरा असर छोड़ सकती है। भले ही वे उसे शब्दों में न बता पाएं, लेकिन उसका प्रभाव उनके व्यवहार और रोजमर्रा की जिंदगी में दिख सकता है। हर बच्चा एक फूल की तरह होता है। यदि उसकी सही देखभाल की जाए, तो उसका भविष्य और भी सुंदर बन सकता है।

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