अररिया (बिहार): केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के सीमांचल क्षेत्र में एक कार्यक्रम के दौरान बड़ा राजनीतिक बयान देते हुए कहा कि यदि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनती है तो “हर घुसपैठिए को बाहर निकाला जाएगा।” यह टिप्पणी सशस्त्र सीमा बल (SSB) के नए बॉर्डर आउटपोस्ट और 175 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के उद्घाटन के मौके पर आई, लेकिन इसका सीधा फोकस 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर था।
यह बयान ऐसे समय आया है जब बंगाल में अप्रैल–मई 2026 में 294 सीटों पर चुनाव होने की संभावना है। फिलहाल राज्य में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार है और भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर चुकी है।
सीमांचल से बंगाल तक: किसकी स्थिति है मजबूत?
अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार वाला सीमांचल इलाका भौगोलिक रूप से संवेदनशील माना जाता है। यह नेपाल और बांग्लादेश सीमा के नजदीक है और यहां अवैध घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है। अमित शाह का यह बयान केवल स्थानीय कार्यक्रम तक सीमित नहीं था। उन्होंने साफ कहा कि भाजपा बंगाल चुनाव जीतेगी और सत्ता में आते ही कार्रवाई करेगी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सीमावर्ती इलाके से दिया गया यह बयान रणनीतिक है-यह सुरक्षा और जनसंख्या बदलाव को चुनावी मुद्दा बनाने का संकेत देता है।
घुसपैठ और ‘डेमोग्राफिक चेंज’ पर चिंता
शाह ने अपने भाषण में कहा कि अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। उनका तर्क है कि इससे सीमावर्ती इलाकों में अतिक्रमण बढ़ता है और जनसंख्या संरचना में बदलाव आता है, जिससे संस्कृति और सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 27.01% थी। अनुमान है कि 2025 तक यह 28–29% तक पहुंच सकती है। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे कुछ जिलों में मुस्लिम बहुलता पहले से है।
भाजपा इस बदलाव को अवैध प्रवास से जोड़ती है, जबकि विपक्ष का कहना है कि जनसंख्या परिवर्तन के पीछे प्राकृतिक वृद्धि, सामाजिक-आर्थिक कारक और आंतरिक प्रवास भी कारण हो सकते हैं।
SIR और मतदाता सूची पर विवाद
हाल के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) अभियान के दौरान मतदाता सूची की जांच हुई और कुछ नाम हटाए गए। भाजपा इसे व्यवस्था सुधार की प्रक्रिया बताती है, जबकि विपक्षी दल इसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश बताते हैं। यह मुद्दा चुनावी राजनीति में भावनात्मक और संवेदनशील दोनों है। इससे सीमावर्ती जिलों में ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ सकती है।
विपक्ष का पलटवार
AIMIM के नेता अख्तरुल इमान ने शाह के बयान को बंगाल के लोगों को बदनाम करने वाला बताया। वहीं CPI(ML) के नेताओं ने कहा कि SIR प्रक्रिया में किसी घुसपैठिए की पहचान नहीं हुई और यह मुद्दा राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए उठाया जा रहा है।
तृणमूल कांग्रेस का रुख भी पहले से स्पष्ट रहा है-पार्टी भाजपा पर सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने का आरोप लगाती रही है।
चुनावी नैरेटिव की टक्करः
2026 के चुनाव में दो बड़े नैरेटिव आमने-सामने दिख रहे हैं-
-भाजपा का फोकस: राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठ और जनसंख्या संतुलन।
-टीएमसी का फोकस: विकास, कल्याणकारी योजनाएं और क्षेत्रीय अस्मिता।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीमावर्ती जिलों में सुरक्षा का मुद्दा असर डाल सकता है। हालांकि राज्यव्यापी नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि मतदाता रोजगार, महंगाई और सामाजिक योजनाओं को कितना महत्व देते हैं।
अररिया से दिया गया अमित शाह का बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि 2026 के चुनावी एजेंडे का संकेत है। भाजपा सुरक्षा और पहचान की राजनीति को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति बना रही है। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस विकास मॉडल और सामाजिक योजनाओं के आधार पर जनता के बीच जाने की तैयारी में है।