रविवार सुबह। दक्षिण कोलकाता के एक आवासीय परिसर की बालकनी में खड़ी मल्लीका देख रही थी कि उसका आठ साल का बेटा ऋधान खुद ही जूते की फीता बांधने की कोशिश कर रहा है। तीन बार फीता खुल गया। चौथी बार भी गांठ कस गई। अंदर से दादू बोले, “अरे, दे ना, मैं बांध देता हूं!” मल्लीका हंसी और सिर हिलाते हुए बोली—नहीं पापा, वह कर पाएगा।
इस “कर पाएगा” शब्द के भीतर ही आधुनिक पालन-पोषण का एक बड़ा दर्शन छिपा है—संतान को निर्भर न बनाकर स्वतंत्र करना। हमारी पीढ़ी बड़ी हुई है “यह मत छुओ”, “वो मत करो”, “मैं कर देता हूं”— जैसी सतर्क चेतावनियों के बीच। परिणामस्वरूप,अक्सर जिम्मेदारी लेने से पहले ही हमें तैयार समाधान मिल जाता था। लेकिन आज के माता-पिता थोड़ा अलग सोचते हैं। वे जानते हैं, दुनिया तेजी से बदल रही है।
भविष्य की लड़ाई केवल अंकों की नहीं, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता की भी होगी। स्वतंत्र बच्चा मतलब अव्यवस्थित बच्चा? बिल्कुल नहीं। बल्कि वही बच्चा स्वतंत्र है जो अपना बैग खुद पैक करता है, अपनी गलतियों को स्वीकार करता है, और जरूरत पड़ने पर “नहीं” कहना जानता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार छोटे-छोटे निर्णय लेने का अवसर मिलने पर बच्चे के दिमाग में आत्मविश्वास के बीज बोए जाते हैं। जैसे—आज कौन सा कपड़ा पहनना है, कौन सी कहानी पढ़नी है, या पॉकेट मनी में कितना बचाना है। निर्णय गलत भी हो तो वह सीखने का पाठ बनता है।
मल्लीका के बेटे ने एक दिन टिफिनबॉक्स घर पर छोड़ दिया। स्कूल से लौटकर उसका चेहरा मुरझाया हुआ था। “भूख लगी थी, बहुत तकलीफ़ हुई,” उसने कहा। मल्लीका उस दिन चाहकर भी स्कूल जाकर टिफिन पहुंचा सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। क्योंकि वह चाहती थी कि ऋधान समझे—अपनी चीजों की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए। अगले दिन से बच्चा अपने बैग को दरवाजे के पास रखकर ही सोता है। स्वतंत्रता सिखाना अवहेलना नहीं है। बल्कि साथ में रहकर धीरे-धीरे हटने की महीन कला है।
उदाहरण के लिए, लड़की साइकिल सीख रही है। पिता पीछे से सीट पकड़कर खड़े हैं। एक समय ऐसा आएगा जब हाथ छोड़ना होगा। गिरने पर घुटने फटेंगे, रोना भी आएगा। लेकिन यही गिरना संतुलन सिखाता है।
माता-पिता के लिए एक और बड़ा चुनौती—तुलना न करना। “देखो, मोहल्ले की रिया कितनी सुंदर नाचती है!”—यह एक वाक्य ही बच्चे की आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकता है। स्वतंत्र बच्चा बनाने के लिए उसकी व्यक्तिगतता को स्वीकार करना होगा। वह अंकगणित में कमजोर हो सकता है, लेकिन कहानियां बनाने में माहिर। शायद क्रिकेट में नहीं, लेकिन रसोई में उसका उत्साह।
डिजिटल युग में स्वतंत्रता और भी जटिल है। मोबाइल हाथ में देने से क्या स्वतंत्रता मिल जाती है? नहीं। बल्कि तकनीक के उपयोग के नियम सिखाना, ऑनलाइन सुरक्षा समझाना—ये भी स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। नियंत्रण नहीं, बल्कि जागरूकता आवश्यक है। सबसे बड़ी बात, माता-पिता को अपने डर को संभालना होगा। बच्चे की असफलता, तकलीफ, अस्वीकृति—इनसे हमेशा उसे छुपाया नहीं जा सकता। बल्कि छोटे-छोटे झटके झेलना सीख ले तो बड़े तूफानों में भी वह स्थिर रहेगा।
ऋधान आजकल खुद ही स्कूल बस में चढ़ता है, खुद ही होमवर्क की सूची बनाता है। हर दिन परिपूर्ण नहीं होता। फिर भी मल्लीका जानती है, हर अधूरी कोशिश में एक आत्मनिर्भर व्यक्ति बन रहा है। बच्चे को स्वतंत्र बनाना मतलब उसे छोड़ देना नहीं, बल्कि उसे अपने पंखों पर भरोसा करना सिखाना है। अगर हम थोड़ा धैर्य रखें, थोड़ा पीछे हटें, तो देखेंगे—छोटे हाथ एक दिन सच में आकाश छू सकते हैं।