ध्यान और एकाग्रता की कमी के कारण पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता। माता-पिता की बात नहीं सुनता। पूरे समय शरारत करता रहता है। शांत होकर किसी जगह नहीं बैठता। बच्चों को लेकर यह शिकायत कई माता-पिता करते हैं। चाहे जितनी डांट-डपट करें, बच्चा किसी तरह नहीं सुनता। तब कभी-कभी अनजाने में मारपीट तक करनी पड़ती है। लेकिन डांटने या मारने से इस तरह की समस्याओं का समाधान नहीं होता। बच्चे को शांत करने और उसके अंदर धैर्य व ध्यान बढ़ाने के लिए जापानियों की तरह 3 तकनीकें अपनाई जा सकती हैं। इससे बच्चे की पढ़ाई में भी मन लगेगा।
शिसा कंको
शिसा कंको का अर्थ है ‘पॉइंटिंग एंड कॉलिंग’। इस पद्धति को अपनाने से काम में गलती होने की संभावना 85% तक कम हो जाती है। इसमें बच्चे को जोर-जोर से पढ़ने के लिए कहा जाता है। साथ ही लिखते समय वह पढ़ते हुए उच्चारण करके प्रैक्टिस करेगा। इससे जो वह पढ़ेगा या लिखेगा वह कान में जाएगा और दिमाग में रहेगा। साथ ही जल्दी याद भी होगा। इससे एकाग्रता बनेगी और पढ़ाई के समय ध्यान किसी और दिशा में नहीं जाएगा।
काइजेन
जापान में इस काइजेन पद्धति को छोटे से बड़े सभी अपनाते हैं। इस पद्धति से शरीर की सुस्ती दूर होती है। काइजेन का अर्थ है पसंदीदा काम करने के माध्यम से काम पर ध्यान केंद्रित करना। रोजाना 1 मिनट से 15 मिनट तक पसंदीदा काम करना होगा। इसे निश्चित समय पर प्रतिदिन करना चाहिए। पढ़ाई, गाना या जो भी पसंद हो, वही करना कहा जाता है। यह काइजेन चिंता कम करता है और किसी काम पर ध्यान बढ़ाने में मदद करता है। काम के प्रति उदासीनता न हो, इसके लिए जापानी लोग काइजेन पद्धति अपनाते हैं। आप भी अपने बच्चे को रोजाना 15 मिनट उसके पसंदीदा काम करने दें।
पॉमोडोरो विथ मूवमेंट (25-5 पद्धति)
उत्साही बच्चों को लगातार पढ़ने बैठाना बहुत मुश्किल होता है। 10 मिनट भी वे शांत नहीं बैठते। इस स्थिति में काम आता है पॉमोडोरो विथ मूवमेंट। इसमें बच्चे को 25 मिनट लगातार किसी काम के लिए कहा जाता है। उसके बाद 5 मिनट का ब्रेक लिया जाता है। पढ़ाई हो या खेल-कूद, हर क्षेत्र में इस तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। इससे काम के प्रति उदासीनता नहीं बनेगी और ध्यान बढ़ेगा।