पूरा दिन काम का तनाव, व्यायाम का समय न होना, रात को देर से खाना, ये सभी आदतें छोटी उम्र में समझ में नहीं आती लेकिन लंबे समय तक जारी रहने पर अत्यंत हानिकारक होती हैं। अब ज्यादातर लोग बैठे-बैठे काम करते हैं। शरीर को हिलने-डुलने की जगह लगभग नहीं मिलती। इसके साथ उल्टा-सीधा खान-पान भी मौजूद है। इसका असर सबसे पहले आपके पेट पर पड़ता है। अवांछित चर्बी पेट के चारों ओर जमा हो जाती है। जिसे चिकित्सकीय शब्दावली में विसरल फैट कहा जाता है। यह फैट शरीर के अंदर महत्वपूर्ण अंगों के चारों ओर जमा होकर गंभीर समस्याओं का कारण बन जाता है।
पेट की मांसपेशियां हमारे शरीर के लिए एक प्रकार की प्राकृतिक बेल्ट की तरह काम करती हैं। ये अंगों को सही जगह पर बनाए रखती हैं। मेरुदंड को सहारा देती हैं। चलने, किसी भारी चीज उठाने या छींक-खांसी के समय शरीर को स्थिर रखती हैं लेकिन लंबे समय तक पेट में चर्बी जमा होने पर यह सामान्य संतुलन बिगड़ जाता है, जो भविष्य में हर्निया सहित कई जोखिम बढ़ा सकता है।
असल में पेट की मांसपेशियां एक साथ काम करके मेरुदंड को स्थिर रखती हैं। हमारे शरीर की मुद्रा को सही रखती हैं, अंदर के विभिन्न अंगों की स्थिति बनाए रखती हैं। सांस लेने या हिलने-डुलने के समय जो दबाव पैदा होता है, उसे सहने की क्षमता इन मांसपेशियों में होती है लेकिन विसरल फैट इस दबाव के सामान्य वितरण को बदल देता है, पेट में लगातार दबाव पैदा करता है। लंबे समय तक यह दबाव बना रहने पर मांसपेशियों के फाइबर धीरे-धीरे पतले और कमजोर हो जाते हैं। इसके कारण पेट में हर्निया होने का खतरा बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, अतिरिक्त चर्बी के कारण पेट की मांसपेशियां सही तरीके से सक्रिय नहीं होतीं। इसके परिणामस्वरूप हाथ-पांव कमजोर पड़ जाते हैं। इसी तरह कोर मसल भी ताकत खो देता है।
पेट की चर्बी शरीर के संतुलन को भी बदल देती है। शरीर का संतुलन आगे की ओर झुक जाता है और सामान्य मुद्रा बिगड़ जाती है, कमर और पीठ पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे पीठ में दर्द और पेट की मांसपेशियों में थकान पैदा होती है। साथ ही विसरल फैट से निकलने वाले सूजन पैदा करने वाले हार्मोन मांसपेशियों की सामान्य मरम्मत प्रक्रिया में बाधा डालते हैं, जिससे व्यायाम करने के बावजूद वांछित ताकत वापस पाने में समस्या होती है।
महिलाओं के मामले में उम्र बढ़ने और मेनोपॉज़ के बाद समस्या और बढ़ जाती है। एस्ट्रोजेन कम होने के कारण पेट की ओर चर्बी जमा होती है और मांसपेशियां कमजोर होती हैं—इस स्थिति को सर्कोपेनिक ओबेसिटी कहा जाता है। इसमें हर्निया और चलने-फिरने की समस्याओं का जोखिम काफी बढ़ जाता है लेकिन सही जीवनशैली अपनाने से इस जोखिम को कम किया जा सकता है। नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद और सक्रिय जीवन शैली ही पेट की चर्बी और मांसपेशियों की कमजोरी से मुक्ति पाने का सबसे अच्छा रास्ता है।