मुंह बंद नहीं हो पा रहा था बच्चे का। ऑटो-इम्यून बीमारी की चपेट में आने से मुंह की नसों और जबड़े की हालत ऐसी हो गई थी कि करीब ढाई साल, यानी लगभग तीन साल तक बच्ची का मुंह खुला ही रहा। कई जगह इलाज कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आखिरकार आर अहमद डेंटल कॉलेज ने असंभव को संभव कर दिखाया। अब बच्ची का मुंह बंद हो पा रहा है और ऑटो-इम्यून बीमारी का इलाज जारी है।
ऑटो-इम्यून बीमारी वह स्थिति होती है, जिसमें शरीर की इम्यूनिटी बाहरी कीटाणुओं से लड़ने के बजाय अपने ही शरीर के किसी हिस्से पर हमला करने लगती है। एक मामूली वायरल संक्रमण के बाद इसी तरह की ऑटो-इम्यून बीमारी के कारण करीब 10 साल की सोहिनी घोषाल (नाम बदला हुआ) का जबड़ा लगभग जाम हो गया था। नतीजा यह हुआ कि वह लगातार ढाई साल तक मुंह बंद नहीं कर सकी। इस दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी के कारण उसे दिन-रात मुंह खोलकर ही रहना पड़ा। लंबे समय तक मुंह खुले रहने से मुंह के अंदर की लार सूख गई, जबड़े का सामान्य संतुलन बिगड़ गया और दांत भी अपनी प्राकृतिक स्थिति से धीरे-धीरे ऊपर की ओर खिसकने लगे। देश के कई नामी निजी अस्पतालों में इलाज कराने के बावजूद मुंह बंद करने का कोई उपाय नहीं मिल सका। आखिरकार बच्ची को राहत मिली आर अहमद डेंटल कॉलेज में।
डॉक्टरों के अनुसार, सोहिनी जिस दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थी, उसे एक्यूट डिसेमिनेटेड एन्सेफालोमायलाइटिस यानी एडीईएम कहा जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, दस लाख लोगों में औसतन सिर्फ एक या दो लोग ही इस बीमारी से प्रभावित होते हैं। इस बीमारी में शरीर की इम्यून सिस्टम गलती से अपने ही दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड की नसों पर हमला कर देती है। इसके कारण चेहरे की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली नसें गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। यही वजह थी कि 912 दिनों तक बच्ची का मुंह बंद नहीं हो पाया।
बेटी के इलाज के लिए परिवार ने कोलकाता और दूसरे राज्यों के कई बड़े निजी अस्पतालों के चक्कर लगाए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अंततः मौलाली स्थित सरकारी आर अहमद डेंटल कॉलेज इस बच्ची के लिए जीवनरक्षक साबित हुआ। यहां इलाज के लिए एक विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया, जिसमें कॉलेज के प्रिंसिपल तपनकुमार गिरी और दंत रोग विशेषज्ञ सायन चट्टोपाध्याय, देवश्री बराल और राजू विश्वास शामिल थे। जांच में पता चला कि लंबे समय तक मुंह खुले रहने के कारण सोहिनी के दांत सुप्रा-इरप्टेड हो गए थे यानी वे अपनी सामान्य स्थिति से काफी ऊपर आ चुके थे। डॉक्टरों के मुताबिक, दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी के इलाज के साथ-साथ मुंह बंद करना बेहद जरूरी हो गया था। लंबे समय तक मुंह खुले रहने से दांतों के खराब होने, मुंह सूखने और संक्रमण का खतरा लगातार बढ़ रहा था।
स्थिति को देखते हुए डॉक्टर राजू विश्वास की अगुआई में फैसला लिया गया कि मुंह बंद करने के लिए पीछे के दांत निकालना ही एकमात्र व्यावहारिक उपाय है। कई दौर की चर्चा के बाद यह निर्णय लागू किया गया। सफलतापूर्वक पीछे के दांत निकालने के बाद आखिरकार हाल ही में बच्ची का मुंह बंद करना संभव हो सका। डॉक्टरों का कहना है कि इससे भविष्य में दांतों के खराब होने और संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाएगा। साथ ही एडीईएम का इलाज भी लगातार जारी है।