जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, देव डी और ओए लकी लकी ओए जैसी हिट फिल्में देने के बावजूद अभिनेता अभय देओल लंबे समय तक बॉलीवुड से दूर नजर आए। इसकी वजह काम की कमी नहीं थी बल्कि उनकी शारीरिक परेशानी थी, जिसने उन्हें इस दुनिया से कुछ समय के लिए दूर रहने पर मजबूर कर दिया। अभय आमतौर पर अपनी निजी बातें सोशल मीडिया पर साझा नहीं करते लेकिन हाल ही में उन्होंने अपने प्रशंसकों को यह बताने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया कि किस तरह के इलाज से उन्हें फायदा मिला। सनी और बॉबी देओल के चचेरे भाई अभय देओल ने खुद अपने इलाज का अनुभव साझा किया।
अभिनेता लंबे समय से घुटनों के दर्द और सायटिका की समस्या से पीड़ित थे लेकिन उन्होंने सर्जरी कराने से इनकार कर दिया। इसके बाद वह दक्षिण कोरिया गए, जहां एक विशेष पद्धति से इलाज करवाकर अब काफी हद तक स्वस्थ हो चुके हैं। अभय ने बताया कि वह लंबे समय से घुटने और सायटिका के दर्द से जूझ रहे थे और कई बार मानसिक रूप से भी टूट जाते थे। इसके बावजूद वह किसी भी तरह की सर्जरी नहीं कराना चाहते थे। इसी दौरान उन्हें स्टेम सेल थेरेपी के बारे में जानकारी मिली। इस विषय पर अध्ययन करने के बाद उन्हें लगा कि यह प्रक्रिया काफी सुरक्षित है और इसे अपनाया जा सकता है।
स्टेम सेल थेरेपी कराने के बाद अभय को यह इलाज काफी प्रभावी लगा। उनका कहना है कि किसी भी कृत्रिम सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया बल्कि उनके शरीर की अपनी कोशिकाओं ने उन्हें दोबारा स्वस्थ किया। इस थेरेपी की मदद से उन्हें जीवन फिर से मिला है। अभय ने यह भी बताया कि इलाज के दूसरे चरण के लिए वह हाल ही में दोबारा कोरिया गए थे। उस समय उनके शरीर की कोशिकाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित भी कर लिया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर दोबारा उसी थेरेपी में उनका इस्तेमाल किया जा सके।
स्टेम सेल क्या होता हैं?
डॉक्टरों के मुताबिक स्टेम सेल शरीर में मौजूद एक विशेष प्रकार की कोशिकाएं होती हैं, जो आमतौर पर टिश्यू के भीतर पाई जाती हैं। इनका काम मुख्य रूप से दो तरह का होता है। पहला, शरीर में नई कोशिकाओं का निर्माण करना, जिसे मेडिकल भाषा में सेल्फ रिन्यूअल कहा जाता है। दूसरा, नई तरह की कोशिकाओं में बदल जाना, जिसे डिफरेंशिएशन कहा जाता है। किसी भी टिश्यू को नुकसान होने पर स्टेम सेल खुद ही उसकी मरम्मत करने में सक्षम होते हैं।
स्टेम सेल थेरेपी क्या है?
स्टेम सेल थेरेपी को रीजेनेरेटिव मेडिसिन भी कहा जाता है। बच्चे के जन्म के बाद मां के शरीर से निकलने वाली प्लेसेंटा में स्टेम सेल मौजूद होते हैं, इसलिए उसके संरक्षण पर जोर दिया जाता है। बाद में वैज्ञानिक वहां से आवश्यक कोशिकाएं निकालकर इस तरह प्रोग्राम करते हैं कि वे जिस शरीर में डाली जाएं, वहां की जरूरत के अनुसार काम करें। यही प्रक्रिया स्टेम सेल थेरेपी कहलाती है। कई मामलों में व्यक्ति के अपने शरीर से भी स्टेम सेल एकत्र किए जाते हैं। ऐसे मामलों में बोन मैरो से कोशिकाएं निकालकर उन्हें प्रोग्राम किया जाता है और फिर जरूरत के अनुसार इंजेक्शन के माध्यम से शरीर में डाला जाता है।