वाशिंगटनः अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव, युद्धविराम और संभावित शांति समझौते को लेकर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का इतिहास बताता है कि किसी संघर्ष को रोकने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर करना जितना आसान होता है, उसे लंबे समय तक टिकाए रखना उतना ही कठिन साबित होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान हालात को समझने के लिए प्राचीन रोम और फारसी साम्राज्य (आधुनिक ईरान का ऐतिहासिक स्वरूप) के बीच चले लंबे संघर्षों पर नजर डालना उपयोगी हो सकता है। दोनों शक्तियों के बीच सदियों तक युद्ध, समझौते, संघर्षविराम और फिर नए टकराव का सिलसिला चलता रहा।
सदियों तक टकराते रहे दो साम्राज्य
प्राचीन फारस में पहले पार्थियन और बाद में सासानी वंश का शासन रहा। दूसरी ओर रोम उस समय दुनिया की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी ताकतों में शामिल था। दोनों के बीच प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा अक्सर युद्ध में बदल जाती थी।
53 ईसा पूर्व में रोमन सेनापति क्रैसस ने फारस पर आक्रमण किया, लेकिन यह अभियान रोम के लिए विनाशकारी साबित हुआ। क्रैसस मारा गया और हजारों सैनिक युद्धभूमि में ढेर हो गए। इस हार के बाद रोम को अपनी सीमाओं को स्वीकार करना पड़ा और यूफ्रेट्स नदी को दोनों साम्राज्यों के बीच सीमा मानने पर सहमत होना पड़ा।
आर्मेनिया बना विवाद की सबसे बड़ी वजह
रोम और फारस के बीच अधिकांश संघर्ष आर्मेनिया को लेकर हुए। यह क्षेत्र दोनों साम्राज्यों के बीच रणनीतिक बफर जोन की तरह था। 63 ईस्वी में हुए रैंडेया समझौते के तहत एक नई व्यवस्था बनाई गई, लेकिन समय बीतने के साथ दोनों पक्षों ने इसकी व्याख्या अपने-अपने हितों के अनुसार करनी शुरू कर दी।
नतीजा यह हुआ कि कुछ दशकों बाद फिर युद्ध छिड़ गया। रोमन सम्राट ट्राजन ने 114 ईस्वी में बड़े सैन्य अभियान के जरिए फारसी राजधानी तक पर कब्जा कर लिया, लेकिन यह सफलता अस्थायी साबित हुई। उनके निधन के बाद रोम लगभग सभी जीते हुए क्षेत्र गंवा बैठा।
संधियां हुईं, लेकिन अविश्वास नहीं टूटा
224 ईस्वी में सासानी वंश के सत्ता में आने के बाद संघर्ष और तीखा हो गया। दोनों पक्षों ने कई बार समझौते किए, लेकिन उनमें से अधिकांश टिक नहीं सके। एक समझौते में रोम को आर्थिक दंड भुगतना पड़ा, जबकि दूसरे में उसे आर्मेनिया से दूर रहने की शर्त माननी पड़ी।
लेकिन जैसे ही किसी एक पक्ष को ताकत मिली, वह समझौते की शर्तों को बदलने या नजरअंदाज करने की कोशिश करने लगा। परिणामस्वरूप नए युद्ध शुरू होते रहे। 260 ईस्वी में तो फारसी सेना ने रोमन सम्राट वैलेरियन को ही बंदी बना लिया था, जो रोमन इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य और राजनीतिक पराजयों में गिना जाता है।
'शाश्वत शांति' भी आठ साल नहीं टिक सकी
532 ईस्वी में दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ, जिसे 'एटरनल पीस' यानी 'शाश्वत शांति' का नाम दिया गया। उस समय इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया गया, लेकिन यह समझौता आठ वर्ष भी नहीं चल पाया और दोनों साम्राज्य फिर युद्ध में उतर आए।
इतिहासकारों के अनुसार, इसका कारण यह था कि समझौते ने तत्काल संकट को तो टाल दिया, लेकिन मूल राजनीतिक और सामरिक मतभेद जस के तस बने रहे।
अमेरिका और ईरान के लिए क्या सबक?
आज अमेरिका और ईरान के बीच भी विवाद केवल किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं है। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव, सुरक्षा चिंताएं, प्रतिबंध और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति जैसे कई जटिल मुद्दे दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करते हैं।
इतिहास यह संकेत देता है कि यदि केवल युद्धविराम या अस्थायी समझौते पर जोर दिया जाए और मूल विवादों का समाधान न निकले, तो तनाव दोबारा उभर सकता है। रोम और फारस के बीच आर्मेनिया का विवाद अंततः सुलझा जरूर, लेकिन इसमें चार शताब्दियों से अधिक समय लगा।
भविष्य क्या कहता है?
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौता सफल होगा या नहीं, इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतिहास का अनुभव बताता है कि स्थायी शांति केवल दस्तावेजों से नहीं आती, बल्कि विश्वास निर्माण, संतुलित हितों और दीर्घकालिक राजनीतिक इच्छाशक्ति से बनती है।
यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी समझौते की वास्तविक परीक्षा उसके हस्ताक्षर के दिन नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में होती है। अमेरिका और ईरान के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती युद्ध रोकने की नहीं, बल्कि शांति को टिकाए रखने की है।