वाशिंगटनः ईरान और अमेरिका के बीच विवाद काफी पुराना है। हालांकि अब तक यह राजनीतिक तनाव तक ही सीमित था, लेकिन इस बार यह रक्तरंजित संघर्ष का रूप ले चुका है। शनिवार को इज़राइल के साथ मिलकर अमेरिका ने ईरान पर हमला शुरू किया। मामला अब केवल परमाणु हथियार रोकने तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे सरकार बदलने की बात कही है। लेकिन आखिर ईरान और अमेरिका के बीच यह टकराव क्यों है? इसकी शुरुआत कब हुई?
अमेरिकी राजनयिकों का अपहरण
‘द इकॉनमिस्ट’ में प्रकाशित 'ईरान पर अमेरिका का हमला एक वर्जित कदम को स्थापित रणनीति में बदल देता है' रिपोर्ट में स्टीवन साइमन के अनुसार इसकी शुरुआत 1979 में हुई। ईरान में मोहम्मद रज़ा पहलवी का पतन हुआ और इस्लामी क्रांति आई। इसके बाद क्रांतिकारियों के एक समूह ने अमेरिकी दूतावास पर कब्ज़ा कर लिया। 52 अमेरिकी राजनयिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया। यहीं से ईरान–अमेरिका संबंध बिगड़ने लगे। हालांकि सीधे सैन्य हमले की बात तब नहीं थी।
परोक्ष रूप से दबाव
लंबे समय तक अमेरिका ने ईरान के खिलाफ परोक्ष रूप से संघर्ष जारी रखा-प्रतिबंध, गुप्त अभियान, साइबर ऑपरेशन कुछ भी छोड़ा नहीं गया। इज़राइल जैसे सहयोगी देशों के साथ मिलकर हमले भी किए गए, लेकिन पर्दे के पीछे से। अमेरिका का तर्क था कि सीधे युद्ध में उतरने से तेल बाज़ार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
परमाणु कार्यक्रम और रणनीति में बदलाव
ईरान यूरेनियम का भंडारण जारी रखे हुए है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं। लेकिन जितनी मात्रा में उसके पास यूरेनियम होने का संदेह है, उससे वह परमाणु बम बना सकता है। यहीं से अमेरिका की रणनीति में बदलाव शुरू हुआ।
पहला सीधा हमला
सीधा हमला सबसे पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किया। पिछले वर्ष जून में ‘मिडनाइट हैमर’ अभियान के तहत बी-2 युद्धक विमानों से ईरान के फोर्डो, नातांज़ और इस्फहान के परमाणु केंद्रों पर हमला किया गया। इस हमले के साथ दशकों से चला आ रहा एक अनलिखा संतुलन टूट गया।
हमले की लागत और बदलती स्थिति
पहले माना जाता था कि ईरान पर हमला महंगा पड़ेगा। लेकिन पिछले एक वर्ष में हालात बदल गए। क्षेत्रीय संघर्षों के कारण ईरान कमजोर हुआ है। ‘मिडनाइट हैमर’ अभियान ने अमेरिका को यह विश्वास भी दिलाया कि बड़े प्रतिशोध की आशंका कम है।
इज़राइल फैक्टर
पश्चिम एशिया की कूटनीति में एक आम धारणा है कि इज़राइल हमला करता है और अमेरिका अनिच्छा से शामिल होता है। लेकिन इस बार स्थिति उलटी दिख रही है-अमेरिका ने पहल की और इज़राइल ने सहयोग किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार 49% अमेरिकी नागरिक ईरान पर हमले के खिलाफ हैं, जबकि 27% इसके समर्थन में हैं।
अब अमेरिका क्या चाहता है?
‘द इकॉनमिस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के सामने तीन रास्ते हैं- सरकार को गिराना, जनविद्रोह को बढ़ावा देना, बातचीत के माध्यम से बदलाव लेकिन इनमें से कोई भी आसान नहीं है।
क्या ईरान में शासन बदलेगा?
ईरान की शासन व्यवस्था बहुस्तरीय है और लंबे समय में विकसित हुई है। पहले भी बड़े विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन संगठित नेतृत्व के अभाव में वे राजनीतिक परिवर्तन नहीं ला सके। युद्ध केवल विनाश ही नहीं करता, कई बार राष्ट्रीय एकता भी बढ़ाता है। इसलिए अचानक क्रांति या बड़े बदलाव की संभावना कम मानी जा रही है।
समाधान का रास्ता
बातचीत के माध्यम से समाधान संभव है-नेतृत्व बदल सकता है, लेकिन राज्य बना रह सकता है। इसके लिए विश्वास और सुरक्षा की गारंटी आवश्यक है। इतिहास बताता है कि दबाव अंततः थकान लाता है लेकिन वह शांति लाए, यह निश्चित नहीं। इसलिए कूटनीति और व्यावहारिक सोच का संतुलन ही दीर्घकालिक समाधान का मार्ग हो सकता है।