आक्षरिक रूप से इसे ‘स्मृति भ्रम’ या अल्जाइमर्स नहीं कहा जा सकता लेकिन मस्तिष्क पर अत्यधिक दबाव पड़ने के कारण कभी-कभी व्यक्ति चकरा जाता है। रोजमर्रा के सामान्य कामों को करना कठिन हो जाता है। चिकित्सक कहते हैं कि यह वास्तव में एक ‘कॉग्निटिव ओवरलोड’ या मस्तिष्क पर अत्यधिक दबाव का बाहरी संकेत है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ब्रेन फॉग कहा जाता है। वर्तमान में यह ब्रेन फॉगिंग एक महामारी (एपिडेमिक) में बदल चुकी है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बचपन और किशोरावस्था के बाद अचानक जीवन में बहुत सारी जिम्मेदारियां आ जाती हैं। पेशेवर प्रतिस्पर्धा, मुकाबला और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच जीवन अक्सर यांत्रिक हो जाता है। मस्तिष्क को कंप्यूटर की तरह काम करना पड़ता है। एक साथ हजारों काम तेजी से निपटाने की कोशिश में कभी-कभी सिस्टम हैंग होने लगता है। तब ब्रेन फॉगिंग जैसी समस्या सामने आती है।
क्यों अब साधारण काम भी पहाड़ की तरह भारी लगने लगा हैं?
1. डिसीजन फैटिग या निर्णय लेने की थकान
28 से 30 साल की उम्र में आमतौर पर हमें जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने होते हैं। करियर, परिवार, निवेश, यहां तक कि दोपहर का खाना क्या बनेगा। इन छोटे-छोटे मामलों में भी दिमाग लगाना पड़ता है। पूरे दिन में हजारों छोटे-बड़े निर्णय लेने से मस्तिष्क का ‘प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स’ थक जाता है इसलिए मीटिंग के बीच ध्यान भटकना या सामान्य शब्द भूल जाना सामान्य है।
2. माइक्रो-स्ट्रेस
बड़ी कोई त्रासदी नहीं बल्कि पूरे दिन की छोटी-छोटी चिंताएं, फोन नोटिफिकेशन, व्हाट्सएप संदेश, ट्रैफिक जाम, या अगले दिन की डेडलाइन, शरीर में लगातार कोर्टिसोल हार्मोन का स्राव करते हैं। यह हार्मोन आपके मस्तिष्क की ‘साफ सोच’ या सामान्य सोचने की क्षमता को ब्लॉक कर देता है।
3. नींद की गुणवत्ता बनाम नींद का समय
सोने से पहले कई लोग फोन स्क्रॉल करते हैं। इस आदत से नींद की गुणवत्ता खराब होती है। नींद आने में देर होती है। इससे स्लीप साइकिल बाधित होती है। लगातार ऐसा होने पर ब्रेन फॉगिंग की समस्या हो जाती है।
‘कोहरे’ को हटाने के कुछ आसान उपाय:
*सिंगल-टास्किंग: मल्टीटास्किंग छोड़ दें। एक साथ तीन काम करने से मस्तिष्क किसी भी काम को ठीक से प्रोसेस नहीं कर सकता।
*ब्रेन डंप: सोने से पहले अगले दिन के सभी कामों या दिमाग में चल रही सारी चिंताओं की सूची कागज पर लिख दें। इससे मस्तिष्क को लगेगा कि जानकारी सुरक्षित है और वह रात में शांतिपूर्वक विश्राम कर सकेगा।
*‘नो-स्क्रीन’ मॉर्निंग: जागते ही फोन न देखें। पहले 30 मिनट बाहर की रोशनी देखें या अपने साथ समय बिताएं। यह आपके मस्तिष्क का फोकस बनाए रखने में मदद करेगा।