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विमान ईंधन की बढ़ती कीमतों से एयरलाइंस परेशान, पश्चिम बंगाल में वैट कम करने की अपील

दिल्ली और महाराष्ट्र ने घटाया वैट, अब पश्चिम बंगाल से भी राहत की उम्मीद।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध जैसे हालात के बीच विमान ईंधन यानी एटीएफ (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से एयरलाइंस कंपनियों की चिंता बढ़ गई है। एयरलाइंस कंपनियों ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की है कि विमान ईंधन पर टैक्स और वैट में राहत दी जाए, ताकि उन्हें बढ़ते घाटे से कुछ राहत मिल सके। इस बीच स्पाइसजेट के उपाध्यक्ष देबाशीष साहा ने पश्चिम बंगाल सरकार से भी वैट कम करने की मांग की है।

पश्चिम एशिया में तनावपूर्ण स्थिति के कारण अप्रैल महीने में ही घरेलू उड़ानों के लिए विमान ईंधन की कीमतों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी। शुरुआत में कीमत इससे भी ज्यादा बढ़ाने की योजना थी, लेकिन केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल घरेलू सेक्टर में 25 प्रतिशत से अधिक वृद्धि पर रोक लगा दी गई। वहीं अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए अप्रैल में एटीएफ की कीमतों में 100 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की गई थी। इसके बाद मई महीने में अंतरराष्ट्रीय सेक्टर के लिए ईंधन की कीमत प्रति किलोलीटर करीब 1500 डॉलर और बढ़ा दी गई।

केंद्र सरकार ने अप्रैल में कहा था कि मई के अंत में तेल कंपनियां घरेलू सेक्टर में विमान ईंधन की कीमतों की समीक्षा करेंगी और उसके बाद 1 जून से नई दरों पर फैसला लिया जाएगा। इसी संभावना ने एयरलाइंस कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है।

विमान ईंधन की कीमत में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले टैक्स और वैट भी शामिल होते हैं। अलग-अलग राज्यों में वैट की दरें अलग हैं। देश के चार बड़े महानगरों में सबसे अधिक वैट चेन्नई में लिया जाता है, जहां इसकी दर 29 प्रतिशत है। दिल्ली में अब तक 25 प्रतिशत वैट लिया जा रहा था लेकिन एयरलाइंस कंपनियों को राहत देने के लिए दिल्ली की भाजपा सरकार ने इसे घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे दिल्ली एयरपोर्ट पर ईंधन की लागत कुछ कम होगी। इसी तरह महाराष्ट्र सरकार ने भी वैट को 18 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है।

स्पाइसजेट के वाइस प्रेसिडेंट देबाशीष साहा ने दिल्ली से कहा कि एयरलाइंस कंपनियां सबसे अधिक ईंधन दिल्ली और मुंबई से भरवाती हैं। ऐसे में इन दोनों शहरों में वैट कम होने से कंपनियों को बड़ी राहत मिली है। उन्होंने कहा कि दोनों राज्यों की भाजपा सरकारों ने अगले छह महीने तक वैट नहीं बढ़ाने का आश्वासन भी दिया है।

देबाशीष साहा ने कहा कि पश्चिम बंगाल में विमान ईंधन पर 20 प्रतिशत वैट लिया जाता है। राज्य में अब भाजपा की सरकार बनने और ‘डबल इंजन’ व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि पश्चिम बंगाल सरकार भी वैट कम करती है तो ईंधन की बढ़ती कीमतों के बावजूद एयरलाइंस कंपनियों को कुछ राहत मिल सकती है।

एयरलाइंस कंपनियों का कहना है कि रुपये की कीमत में लगातार गिरावट के कारण विदेशी एयरपोर्टों पर ईंधन खरीदने और लैंडिंग-पार्किंग शुल्क चुकाने में खर्च काफी बढ़ गया है। इसके अलावा युद्ध की वजह से ईरान का हवाई क्षेत्र बंद है और भारतीय विमानों के पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र में प्रवेश पर भी रोक लगी हुई है। इस कारण यूरोप और अमेरिका जाने वाली उड़ानों को लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे ईंधन की खपत और परिचालन लागत दोनों बढ़ गई हैं।

कंपनियों का कहना है कि अगर घरेलू सेक्टर में भी विमान ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। कई सेक्टरों में उड़ान संचालन की स्थिति ऐसी हो गई है कि कंपनियां ‘ब्रेक ईवन’ तक नहीं पहुंच पा रही हैं, यानी न लाभ हो रहा है और न ही लागत निकल पा रही है।

एयरलाइंस कंपनियों के सामने एक और समस्या यह है कि अधिकतर विमान लीज पर लिए जाते हैं। यदि उड़ानें बंद भी कर दी जाएं, तब भी विमानों का किराया चुकाना पड़ता है। डॉलर महंगा होने के कारण यह खर्च भी बढ़ता जा रहा है। कंपनियों के मुताबिक किसी एयरलाइन के कुल खर्च का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा केवल ईंधन खरीदने में चला जाता है। इसलिए जितनी अधिक ईंधन कीमतें बढ़ेंगी उतना ही एयरलाइंस का घाटा बढ़ेगा और उसका सीधा असर हवाई किराए पर भी दिखाई देगा।

दूसरी ओर तेल कंपनियों का दावा है कि भारत में फिलहाल प्रति किलोलीटर विमान ईंधन की कीमत करीब 1.05 लाख रुपये है लेकिन इसके बावजूद उन्हें प्रति किलोलीटर लगभग 92 हजार रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनका कहना है कि यदि कीमतों में और बढ़ोतरी नहीं की गई तो तेल कंपनियां खुद आर्थिक संकट में आ सकती हैं।

सूत्रों के मुताबिक केंद्र का पेट्रोलियम मंत्रालय भी इस कोशिश में लगा है कि घरेलू उड़ानों के लिए विमान ईंधन की कीमतों में फिलहाल और वृद्धि न की जाए, ताकि विमानन क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

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