नई दिल्ली: देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक अहम जानकारी सामने आई है। भारत के तरल ईंधन के भंडार केवल 20 से 40 दिनों की खपत के लिए पर्याप्त हैं। इन्हें कई महीनों तक चलने वाला नहीं बनाया जा सकता। ऐसा पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड के सचिव अंजन कुमार मिश्रा ने कहा।
मिश्रा ने बताया, “हमारे पास पहले से कुछ ईंधन का भंडार मौजूद है, लेकिन ऐसा भंडार नहीं बनाया जा सकता जो शायद छह महीने तक चल सके। यह 20 से 40 दिनों के लिए पर्याप्त हो सकता है, लेकिन छह महीने या उससे लंबे समय तक नहीं चल पाएगा।”
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कई महीनों तक चलने वाला विशाल भंडार बनाना व्यावहारिक नहीं है। यह बयान उन्होंने 31 मार्च 2026 को नई दिल्ली में आयोजित पीएचडी चैंबर हाइड्रोकार्बन सम्मेलन 2026 के दौरान दिया।
भंडार की असल तस्वीर
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, भारत की रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जिसमें से लगभग 3.37 मिलियन मीट्रिक टन यानी करीब 64 प्रतिशत भरा हुआ है। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, यदि भंडार पूरी क्षमता पर हो तो यह करीब 9.5 दिनों की खपत के बराबर है, जबकि मौजूदा स्तर पर यह केवल 5 से 6 दिनों तक ही चल सकता है।
हालांकि, रिफाइनरियों और कंपनियों के व्यावसायिक भंडार को मिलाकर कुल उपलब्धता 70 से 74 दिनों तक की जरूरत पूरी कर सकती है। भारत में रोजाना करीब 5 मिलियन बैरल कच्चे तेल की खपत होती है और देश अपनी 85 से 88 प्रतिशत जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है।
पश्चिम एशिया संकट का असर
अंजन कुमार मिश्रा ने माना कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर भारत पर पड़ रहा है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में है। उन्होंने कहा कि सरकार पूरी तरह सतर्क है और हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। उनके अनुसार, देश में फिलहाल किसी तरह की ईंधन की कमी नहीं है और यदि कहीं चिंता है तो वह केवल मनोवैज्ञानिक घबराहट का परिणाम है।
पड़ोसी देशों को भी सहयोग
संकट के समय भारत ने अपने पड़ोसी देशों की भी मदद की है। मिश्रा ने बताया कि बांग्लादेश और श्रीलंका को ऊर्जा आपूर्ति में सहयोग दिया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में क्षेत्रीय सहयोग जरूरी होता है और भारत इस जिम्मेदारी को निभा रहा है।
भारत ने कच्चे तेल के आयात के स्रोतों को पहले की तुलना में काफी विविध बनाया है। अब केवल पश्चिम एशिया पर निर्भरता नहीं है। रूस, वेनेजुएला, मोजाम्बिक और अंगोला जैसे देशों से भी आपूर्ति हो रही है। वर्ष 2026 की शुरुआत में रूस का हिस्सा करीब 30 प्रतिशत रहा, जबकि इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से भी आयात जारी है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए आने वाले आयात का हिस्सा घटकर लगभग 30 से 40 प्रतिशत रह गया है, जबकि करीब 70 प्रतिशत तेल वैकल्पिक मार्गों से आ रहा है।
कीमतों पर असर और आगे की तैयारी
अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा चलता है तो कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन मिश्रा का मानना है कि इसका असर अस्थायी होगा। सरकार भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भंडारण क्षमता बढ़ाने और घरेलू उत्पादन को मजबूत करने पर काम कर रही है। चंडीखोल और पादुर जैसे स्थानों पर अतिरिक्त 6.5 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता विकसित की जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का लक्ष्य कुल भंडार को 90 दिनों तक पहुंचाना है, ताकि किसी भी वैश्विक संकट का बेहतर तरीके से सामना किया जा सके। फिलहाल देश में ईंधन की कोई तात्कालिक कमी नहीं है, लेकिन सीमित भंडारण क्षमता और आयात पर निर्भरता भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति और निरंतर निवेश जरूरी होगा।