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‘उज्ज्वला अब लकड़ी का चूल्हा योजना’ बन चुकी है : डीके शिवकुमार का केंद्र पर तीखा प्रहार

ईंधन संकट, महंगाई और एलपीजी कीमतों को लेकर घेरा। उज्ज्वला योजना की उपलब्धियों के बीच नई चुनौतियां उभरीं।

By श्वेता सिंह

Mar 31, 2026 19:08 IST

बेंगलुरु: कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार (D. K. Shivakumar) ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (Pradhan Mantri Ujjwala Yojana) अब ‘लकड़ी का चूल्हा योजना’ बन गई है।

संयुक्त प्रेस वार्ता में उन्होंने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और उससे उत्पन्न ईंधन संकट को लेकर केंद्र की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के ‘अच्छे दिन’ नारे पर कटाक्ष करते हुए कहा, “अच्छे दिन कहां गए? क्या अब इसे ‘कच्चे दिन’ कहना चाहिए?”

ईधन संकट और महंगाई पर हमला

शिवकुमार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय हालात, खासकर ईरान से जुड़े तनाव के कारण ईंधन आपूर्ति प्रभावित हुई है, लेकिन केंद्र सरकार इस स्थिति से निपटने में विफल रही है। उन्होंने दावा किया कि पांच राज्यों में चुनावी माहौल के बीच आम लोग महंगाई से जूझ रहे हैं। कई जगहों पर होटल बंद हो रहे हैं और लोग गैस की कमी के कारण वैकल्पिक साधनों जैसे बिजली के चूल्हों का उपयोग कर रहे हैं।

कर्नाटक में पिछले 15 दिनों में बिजली की खपत में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस बदलाव की ओर इशारा करती है।

उज्ज्वला योजना: उपलब्धियां बनाम मौजूदा संकट

2016 में शुरू हुई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (Pradhan Mantri Ujjwala Yojana) का उद्देश्य गरीब परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था। इस योजना ने धुएं से होने वाली बीमारियों को कम करने, महिलाओं का समय बचाने और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2026 तक इस योजना से 10.41 से 10.56 करोड़ परिवार जुड़ चुके हैं। अब तक 276 करोड़ से अधिक गैस रिफिल वितरित किए जा चुके हैं और देश में कुल एलपीजी कनेक्शन लगभग 33 करोड़ तक पहुंच गए हैं। बजट 2026 में इसके लिए 9,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

हालांकि, पश्चिम एशिया में तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से एलपीजी आपूर्ति प्रभावित हुई है। भारत अपनी लगभग 60 प्रतिशत एलपीजी जरूरत आयात से पूरी करता है, जिसमें से 90 प्रतिशत इसी मार्ग से आता है।

मार्च 2026 में आयात में कमी के कारण घरेलू गैस सिलेंडर (14.2 किलोग्राम) की कीमत दिल्ली में 60 रुपये बढ़कर 913 रुपये हो गई, जबकि व्यावसायिक सिलेंडर की कीमत में भी लगभग 115 रुपये की बढ़ोतरी हुई।

कई स्थानों पर कालाबाजारी की स्थिति भी सामने आई है, जहां घरेलू गैस 2,000 रुपये और व्यावसायिक गैस 4,000 रुपये तक बिक रही है। ग्रामीण इलाकों में गैस की कमी के चलते लोग फिर से लकड़ी के चूल्हों की ओर लौटने लगे हैं।

बढ़ती महंगाई का व्यापक असर

शिवकुमार ने कहा कि महंगाई का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि कई क्षेत्रों में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं:

निर्माण सामग्री: सीमेंट 50 से 100 रुपये प्रति बैग महंगा, लोहा 47,000 से बढ़कर 59,000 रुपये प्रति टन

दवाइयां: करीब 900 दवाओं की कीमतों में वृद्धि

अन्य वस्तुएं: प्लास्टिक पाइप महंगे, हवाई किराए में 18 प्रतिशत वृद्धि, डाक व पार्सल शुल्क में 34 प्रतिशत बढ़ोतरी।

उन्होंने आरोप लगाया कि “सीमेंट माफिया सक्रिय है, जिससे आम आदमी के लिए घर बनाना मुश्किल हो गया है।”

राज्य और केंद्र में सियासी टकराव

डी. के. शिवकुमार (D. K. Shivakumar) ने कहा कि केंद्र की नीतियां आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही हैं। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार की पांच गारंटी योजनाएं जनता को राहत दे रही हैं। उन्होंने केंद्र से मांग की कि मौजूदा संकट में तुरंत हस्तक्षेप किया जाए और गैस आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। उनका कहना था कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी का उपयोग बढ़ेगा, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव के कारण एलपीजी आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। हालांकि सरकार घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने की कोशिश कर रही है, लेकिन मौजूदा हालात ने उज्ज्वला योजना के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

उज्ज्वला योजना ने पिछले एक दशक में करोड़ों परिवारों को स्वच्छ ईंधन से जोड़ा है, लेकिन मौजूदा वैश्विक संकट और बढ़ती कीमतों ने इसकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस दोहरी चुनौती-आपूर्ति और कीमत से कैसे निपटती है।

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