नई दिल्ली : एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास इस समय कच्चे तेल और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का कुल मिलाकर 250 मिलियन बैरल से अधिक का ऊर्जा भंडार है, जो लगभग 4,000 करोड़ लीटर के बराबर है। यह भंडार पूरी आपूर्ति श्रृंखला के लिए लगभग 7 से 8 सप्ताह तक की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। इससे उन दावों का खंडन होता है कि भारत के पास केवल 25 दिनों का ही तेल भंडार है।
यह भंडार भूमिगत रणनीतिक गुफाओं और भंडारण स्थलों में रखा गया है, जिनमें मैंगलोर, पातुर और विशाखापत्तनम शामिल हैं। इसके अलावा जमीन के ऊपर बने टैंकों, पाइपलाइनों और समुद्र में मौजूद जहाजों में भी भंडारण किया जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की ऊर्जा खरीद नीति राष्ट्रीय हित पर आधारित है। पिछले दस वर्षों में भारत ने तेल आयात के स्रोत 27 देशों से बढ़ाकर 40 देशों तक कर दिए हैं।
हालांकि Strait of Hormuz वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, लेकिन भारत के कुल कच्चे तेल आयात का केवल लगभग 40 प्रतिशत ही इस मार्ग से आता है। बाकी 60 प्रतिशत तेल रूस, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशिया जैसे वैकल्पिक मार्गों से आता है, जिन पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अब वह समय समाप्त हो चुका है जब भारत की ऊर्जा सुरक्षा केवल एक समुद्री मार्ग की स्थिति पर निर्भर करती थी। यदि किसी एक मार्ग में बाधा आती है, तो उसे आपूर्ति संकट नहीं बल्कि प्रबंधित स्रोत परिवर्तन के रूप में संभाला जाता है।
फरवरी 2026 तक रूस भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश बना हुआ है। पिछले तीन वर्षों में अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भारत ने कभी भी रूसी तेल खरीदने के लिए किसी देश की अनुमति पर निर्भरता नहीं रखी। भारत फरवरी 2026 में भी रूस से तेल आयात कर रहा है और रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता है। साथ ही भारत ने G7 द्वारा तय मूल्य सीमा नियमों का पालन किया है।
रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में अमेरिकी ट्रेजरी द्वारा दिया गया 30 दिन का विशेष अनुमति आदेश केवल एक ऐसी बाधा को हटाने जैसा है, जिसे बनाए रखना किसी के हित में नहीं था। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने में भारत की भूमिका को भी स्वीकार किया गया है।
घरेलू स्तर पर 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम हर साल लगभग 44 मिलियन बैरल कच्चे तेल की खपत को कम कर रहा है। भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता अब 258 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष तक पहुंच गई है, जबकि देश की खपत लगभग 210 से 230 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है।
इसी बुनियादी ढांचे की वजह से भारतीय रिफाइनर यूरोप में रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों के बाद पैदा हुई ईंधन कमी को भी पूरा करने में सक्षम रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिफाइनर किसी एक देश या स्रोत पर निर्भर नहीं हैं और यही लचीलापन भारत की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे बड़ी ताकत है।
पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ के आंकड़ों के अनुसार भारत में चार वर्षों तक लगातार पेट्रोल की खुदरा कीमतें स्थिर बनी रहीं। फरवरी 2022 से फरवरी 2026 के बीच दिल्ली में पेट्रोल की कीमतों में 0.67 प्रतिशत की कमी आई, जबकि इसी अवधि में पाकिस्तान में कीमतें 55 प्रतिशत और जर्मनी में 22 प्रतिशत बढ़ीं।
इन कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल पर लगभग 24,500 करोड़ रुपये तथा एलपीजी पर करीब 40,000 करोड़ रुपये का नुकसान अपने ऊपर लिया।
रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में हर निर्णय सुलभता, उपलब्धता और टिकाऊपन के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर लिया जाता है। इसमें यह भी बताया गया है कि पिछले बारह वर्षों में देश के किसी भी पेट्रोल पंप पर ईंधन की कमी नहीं हुई है।