नई दिल्लीः भारत का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार अभी भी विदेशी जहाजों पर निर्भर है और यह स्थिति देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बन सकती है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने रायसीना डायलॉग में कहा कि भारत के लगभग 90 से 95 प्रतिशत माल का व्यापार विदेशी जहाजों के माध्यम से होता है। यदि किसी कारण से कुछ बड़ी वैश्विक शिपिंग कंपनियां भारत का बहिष्कार कर दें, तो इससे देश की आपूर्ति श्रृंखला और अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट पैदा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत का विशाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री मार्ग पर आधारित है। मात्रा के हिसाब से देश का 95 प्रतिशत से अधिक व्यापार समुद्र के जरिए होता है, इसलिए शिपिंग क्षेत्र में बाहरी निर्भरता भारत को वैश्विक परिस्थितियों और दबावों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
सीमित है भारत का समुद्री बेड़ा
सान्याल के अनुसार वर्तमान में भारत के पास लगभग 480 व्यावसायिक समुद्री जहाज हैं, जिनमें टैंकर और कार्गो जहाज शामिल हैं। इसमें मछली पकड़ने वाली नौकाओं को शामिल नहीं किया गया है। हाल के आंकड़ों के अनुसार भारतीय ध्वज वाले जहाजों की संख्या बढ़कर 1,549 तक पहुंच गई है और इनका कुल ग्रॉस टनेज करीब 13.52 मिलियन है। हालांकि भारत के बढ़ते व्यापार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मुकाबले यह क्षमता अभी भी काफी सीमित मानी जाती है।
जहाज निर्माण में उत्तर-पूर्व एशिया का दबदबा
उन्होंने वैश्विक जहाज निर्माण उद्योग में मौजूद असंतुलन की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार दुनिया के लगभग 95 प्रतिशत नए जहाज उत्तर-पूर्व एशिया में बनाए जाते हैं। इसमें चीन की हिस्सेदारी लगभग 55 से 60 प्रतिशत है, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया की हिस्सेदारी करीब 20-20 प्रतिशत के आसपास है। इस तरह जहाज निर्माण का अधिकांश हिस्सा तीन देशों तक ही सीमित है। इसके विपरीत बाकी दुनिया की हिस्सेदारी केवल लगभग 5 प्रतिशत रह जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह असंतुलन भारत के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी तरह की बाधा आती है या शिपिंग कंपनियां किसी कारण से भारत के साथ व्यापारिक गतिविधियां सीमित कर देती हैं, तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और व्यापार पर पड़ सकता है।
सरकार की नई नीतियां और निवेश
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने पिछले दो से तीन वर्षों में समुद्री क्षेत्र से जुड़ी नीतियों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। जहाजों के ध्वजांकन और स्वामित्व से जुड़े नियमों में संशोधन किया गया है और जहाज निर्माण उद्योग को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दिया गया है, ताकि इस क्षेत्र में निवेश और विकास को बढ़ावा मिल सके।
साल 2025 में सरकार ने लगभग 70,000 करोड़ रुपये के एक बड़े पैकेज को मंजूरी दी है। इस पैकेज में जहाज निर्माण के लिए वित्तीय सहायता, मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड की स्थापना और मेगा क्लस्टर विकास जैसी योजनाएं शामिल हैं। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत को वैश्विक जहाज निर्माण में शीर्ष 10 देशों में शामिल किया जाए और 2047 तक इसे दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माण केंद्रों में स्थान दिलाया जाए।
अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की दिलचस्पी
हाल के समय में भारत में जहाज निर्माण को लेकर विदेशी कंपनियों की रुचि भी बढ़ती दिखाई दे रही है। एचडी ह्युंडई और कोचीन शिपयार्ड के बीच संयुक्त उद्यम की संभावनाओं पर बातचीत चल रही है। इसके अलावा मित्सुबिशी जैसी कंपनियां भी भारत में जहाज निर्माण गतिविधियां शुरू करने या स्थानांतरित करने पर विचार कर रही हैं। वैश्विक शिपिंग कंपनी एमएससी ने भी 2025 में अपने 12 जहाज भारतीय ध्वज में शामिल करने का वादा किया है, जिससे इस क्षेत्र में संभावित विस्तार के संकेत मिलते हैं।
संजीव सान्याल ने कहा कि भारत के पास इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की पर्याप्त क्षमता है। देश में मजबूत स्टील उत्पादन, जहाज डिजाइन की क्षमता और कुशल श्रमबल मौजूद है, जो इसे वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र बनने में मदद कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही आज के दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा हो, लेकिन जहाज निर्माण भी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है।
रायसीना डायलॉग में केयरएज ग्रुप के प्रबंध निदेशक मेहुल पंड्या ने भी इस मंच की सराहना करते हुए कहा कि यह सम्मेलन वैश्विक आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर सीखने और चर्चा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
सरकार की नई नीतियों और निवेश से उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले वर्षों में भारत समुद्री क्षेत्र में अपनी क्षमता मजबूत करेगा और विदेशी जहाजों पर निर्भरता कम करते हुए आर्थिक सुरक्षा को और मजबूत बना सकेगा।