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युद्ध के कारण बदला उड़ान मार्ग, एक फ्लाइट पर अतिरिक्त खर्च 50 लाख रुपये!

युद्ध जैसी स्थिति के कारण विमानों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है, जिससे हर उड़ान में लगभग सवा से डेढ़ घंटे अतिरिक्त समय लग रहा है।

नई दिल्ली : लंबी दूरी की एक तरफ की उड़ान पर अब लगभग 25 लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च आ रहा है। आने-जाने में यह खर्च करीब 50 लाख रुपये तक पहुँच रहा है। यह कोई छपाई की गलती नहीं बल्कि सचमुच 50 लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च है।

दिल्ली से उड़ान भरकर पेरिस या यूरोप के अन्य शहरों तक जाने वाली एयर इंडिया की हर फ्लाइट पर यह अतिरिक्त खर्च हो रहा है। केवल एयर इंडिया ही नहीं बल्कि दुनिया की लगभग सभी बड़ी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस को इस भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। हर एयरलाइन पर इसका आर्थिक असर पड़ रहा है। विमान के प्रकार के अनुसार खर्च थोड़ा कम-ज्यादा हो सकता है।

क्यों बढ़ा खर्च?

युद्ध की स्थिति के कारण अब विमानों को घुमकर जाना पड़ रहा है जिससे हर उड़ान में लगभग सवा से डेढ़ घंटे अतिरिक्त समय लग रहा है।

लंबी दूरी की उड़ानों के लिए अधिकतर एयरलाइंस एयरबस 330, बोइंग 777 या बोइंग 787 (ड्रीमलाइनर) जैसे विमानों का उपयोग करती हैं। इन्हें आम तौर पर वाइड-बॉडी एयरक्राफ्ट कहा जाता है। आंकड़ों के अनुसार ड्रीमलाइनर जैसा बड़ा विमान एक घंटे उड़ान भरने में लगभग 7000 किलोग्राम ईंधन खर्च करता है।

एविएशन विशेषज्ञ सुदीप्त चंद्र के अनुसार - दुनिया के बाजार में 1000 किलोग्राम यानी एक टन एविएशन फ्यूल की कीमत लगभग एक लाख रुपये होती है। इसका मतलब है कि ड्रीमलाइनर एक घंटे उड़ान भरने पर करीब सात लाख रुपये का ईंधन खर्च करता है। एयर इंडिया लंबी दूरी की उड़ानों में मुख्य रूप से ड्रीमलाइनर का ही इस्तेमाल करती है। माना जाता है कि किसी विमान के कुल ऑपरेटिंग कॉस्ट का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा ईंधन पर खर्च होता है। इसका मतलब यह है कि अगर एक घंटे में सात लाख रुपये का अतिरिक्त ईंधन जल रहा है, तो उस एक घंटे की कुल ऑपरेटिंग लागत (जिसमें पायलट और क्रू का वेतन, विमान का किराया, रखरखाव, एयरपोर्ट शुल्क, लैंडिंग और पार्किंग चार्ज शामिल हैं) लगभग 21 लाख रुपये हो जाती है। और अब जब उड़ान में करीब सवा घंटा अतिरिक्त लग रहा है तो कुल अतिरिक्त खर्च लगभग 25 लाख रुपये के आसपास पहुँच रहा है।

युद्ध के कारण बंद हुआ अहम हवाई मार्ग

इस स्थिति की वजह युद्ध है। इसके चलते ईरान, इराक और आसपास के देशों का हवाई क्षेत्र फिलहाल बंद है। कतर, सीरिया और कुवैत के ऊपर से भी उड़ानें नहीं जा रही हैं। इन देशों के आसमान में फिलहाल केवल ड्रोन, मिसाइल और लड़ाकू विमान ही उड़ रहे हैं।

भौगोलिक दृष्टि से ईरान, इराक और सीरिया का हवाई क्षेत्र पूर्वी गोलार्ध से पश्चिमी गोलार्ध तक जाने का सबसे छोटा मार्ग माना जाता है।

सिंगापुर, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम और चीन के कई हिस्सों से पश्चिम की ओर जाने वाली उड़ानें पहले भारत में प्रवेश करती थीं। इसके बाद वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के ऊपर से होते हुए ईरान, इराक और सीरिया के रास्ते यूरोप पहुँचती थीं और इसी मार्ग से वापस भी लौटती थीं। यह मार्ग सबसे छोटा था और इसमें ईंधन की बचत होती थी।

लेकिन अब ईरान के हवाई क्षेत्र में प्रवेश संभव न होने के कारण ये उड़ानें भारत में प्रवेश करने के बाद पाकिस्तान नहीं जा पा रही हैं। अब वे मुंबई से मस्कट की ओर मुड़कर जेद्दा के ऊपर से होते हुए मिस्र के रास्ते यूरोप पहुँच रही हैं। इसी वजह से उड़ान में एक से डेढ़ घंटे का अतिरिक्त समय लग रहा है।

छोटे विमानों पर भी असर

करीब छह घंटे तक की छोटी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में आमतौर पर नैरो-बॉडी यानी अपेक्षाकृत छोटे विमान जैसे एयरबस 320, एयरबस 321 या बोइंग 737 का इस्तेमाल किया जाता है। भारत की इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी एयरलाइंस छोटी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में इसी तरह के विमान चलाती हैं।

एक एयरबस 320 विमान एक घंटे की उड़ान में लगभग 2200 किलोग्राम ईंधन खर्च करता है। ऐसे में हर घंटे करीब 2.25 लाख रुपये का अतिरिक्त ईंधन खर्च बढ़ रहा है और कुल अतिरिक्त ऑपरेटिंग लागत लगभग 7 लाख रुपये तक पहुँच रही है।

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