दिसपुर : असम के फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल ने एक महिला को ‘विदेशी’ घोषित किया था। ट्राइब्यूनल के निर्देश के बाद उसे डिटेंशन कैंप में रखा गया। असम के सिलचर स्थित डिटेंशन कैंप में उसे लगभग दो वर्षों तक रखा गया था। अंततः नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) के तहत उसे भारत की नागरिकता मिल गई।
सूत्रों के अनुसार ‘विदेशी’ के रूप में चिन्हित किए जाने और डिटेंशन कैंप में रहने के बाद किसी व्यक्ति को नागरिकता दिए जाने का यह पहला मामला है।
बताया गया है कि उस महिला का नाम दीपाली दास है। 60 वर्षीय दीपाली का जन्म बांग्लादेश के सिलहट में हुआ था। हालांकि 7 फरवरी 1988 को वह असम आ गई थीं और सिलचर के धलाई इलाके के हवाईथांग में रहने लगीं। उनके पास नागरिकता से जुड़े कोई दस्तावेज नहीं होने के कारण असम के फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल ने उन्हें ‘विदेशी’ घोषित कर दिया। नागरिकता के दस्तावेज प्रस्तुत न कर पाने के कारण 2019 में उन्हें डिटेंशन कैंप में रखने का आदेश दिया गया। रिहा होने से पहले वह लगभग दो साल तक उस कैंप में रहीं।
जानकारी के अनुसार रिहाई के बाद दीपाली ने इलाके के एक समाजसेवी से संपर्क किया। साथ ही धर्मानंद देव नामक एक वकील के माध्यम से उन्होंने फिर से भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद उन्हें नागरिकता मिल गई।
सूत्रों के मुताबिक उनकी नागरिकता का प्रमाणपत्र असम के जनगणना संचालन निदेशालय के निदेशक विश्वजीत पेगू ने जारी किया है। प्रमाणपत्र में कहा गया है कि दीपाली को सभी राजनीतिक और अन्य अधिकार, शक्तियाँ तथा सुविधाएँ प्राप्त होंगी। साथ ही उन्हें एक भारतीय नागरिक के सभी दायित्वों, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का पालन भी करना होगा।
वकील धर्मानंद देव ने कहा कि यह मामला केवल अलग ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक भी है। क्योंकि ‘विदेशी’ घोषित किए जाने और डिटेंशन कैंप में रहने के बावजूद अब उन्हें CAA के तहत भारतीय नागरिकता दी गई है। उनके अनुसार, डिटेंशन कैंप में रह चुके किसी व्यक्ति को पहली बार देश की नागरिकता दी गई है।