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लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हटाने का प्रस्तावः 118 सांसदों का समर्थन मिला, कांग्रेस ने क्या कहा?

कांग्रेस ने जारी किया तीन लाइन व्हिप। 9-11 मार्च तक सदन में मौजूद रहने का निर्देश।

By श्वेता सिंह

Mar 06, 2026 18:26 IST

नई दिल्लीः कांग्रेस ने कहा है कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए विपक्ष का प्रस्ताव नियमों के तहत है और इस पर बहस होनी चाहिए। विपक्ष ने स्पीकर पर पक्षपात करने का आरोप लगाया है।

संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत से पहले कांग्रेस ने अपने लोकसभा सांसदों को तीन-लाइन व्हिप जारी किया है। पार्टी ने सभी सांसदों को 9 से 11 मार्च के बीच लोकसभा में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। माना जा रहा है कि इसी दौरान लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए लाया गया प्रस्ताव सदन में लिया जा सकता है।

कांग्रेस महासचि जयराम रमेश ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी विपक्षी दलों ने स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि इस पर 9 मार्च को चर्चा होगी। जयराम रमेश ने यह बताया कि इस नोटिस पर 118 विपक्षी सांसदोंने हस्ताक्षर किये हैं।

संसद का बजट सत्र 9 मार्च से फिर शुरू हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष की ओर से दिया गया वह नोटिस, जिसमें स्पीकर पर सदन की कार्यवाही चलाने में “स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण” रवैया अपनाने और अपने संवैधानिक पद का “दुरुपयोग” करने का आरोप लगाया गया है, अगले सप्ताह चर्चा के लिए पेश किया जा सकता है।

संविधान के प्रावधानों के अनुसार लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है। यह प्रस्ताव साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 94 में स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है, जबकि अनुच्छेद 96 के तहत स्पीकर को सदन में अपना पक्ष रखने का अधिकार भी प्राप्त है।

आमतौर पर ऐसे प्रस्ताव की भाषा की जांच लोकसभा के उपाध्यक्ष द्वारा की जाती है। हालांकि मौजूदा लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद खाली है, इसलिए यह जिम्मेदारी संभवतः अध्यक्षों के पैनल के वरिष्ठतम सदस्य को सौंपी जा सकती है। यह पैनल स्पीकर की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही संचालित करने में सहायता करता है।

लोकसभा के इतिहास में इससे पहले भी कुछ स्पीकरों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं। जी. वी. मावलंकर (1954), हुकम सिंह (1966) और बलराम जाखड़ (1987) के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव आए थे, लेकिन सभी मामलों में प्रस्ताव सदन में खारिज हो गए थे। अब देखना होगा कि अगले सप्ताह प्रस्ताव सदन में आता है या नहीं और उस पर क्या राजनीतिक रुख सामने आता है।

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