नयी दिल्लीः भारत में महिलाओं की वित्तीय भागीदारी को मजबूत बनाकर देश की अर्थव्यवस्था में लगभग ₹40 लाख करोड़ के बराबर अतिरिक्त वृद्धि की संभावना है। यह अनुमान महिलाओं के लिए वित्तीय मंच Lxme-EY इंडिया की संयुक्त रिपोर्ट “अनलॉकिंग हर वेल्थ: द अनटैप्ड इकॉनमी – री-डिजाइनिंग फाइनेंशियल सिस्टम्स फॉर विमेन फ्रॉम इन्क्लूजन मैट्रिक्स टू ओनरशिप आउटकम्स” में सामने आया है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि महिलाओं की भागीदारी दीर्घकालिक वित्तीय निवेश-जैसे पूंजी बाजार, म्यूचुअल फंड और अन्य निवेश साधनों-में बढ़ाई जाए, तो इससे घरेलू बचत मजबूत होगी, पूंजी बाजार का विस्तार होगा और लंबे समय तक चलने वाले निवेश के जरिए राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है।
वित्तीय समावेशन बढ़ा, लेकिन संपत्ति निर्माण की राह कठिन
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में तेज प्रगति की है। वर्तमान में देश में 89 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के पास बैंक खाते हैं और डिजिटल भुगतान भी उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है।
इसके बावजूद रिपोर्ट एक अहम विरोधाभास की ओर इशारा करती है-वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ने के बावजूद महिलाओं के पास आर्थिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता और संपत्ति निर्माण के अवसर सीमित हैं।
इसी स्थिति को समझने के लिए रिपोर्ट में पहली बार महिला वित्तीय समृद्धि सूचकांक (विमेन फाइनेंशियल प्रॉस्पेरिटी इंडेक्स) प्रस्तुत किया गया है। इस सूचकांक में भारत को 100 में से केवल 28.1 अंक मिले हैं। यह दर्शाता है कि महिलाओं की आर्थिक प्रगति अभी भी कई संरचनात्मक बाधाओं से प्रभावित है।
रोजगार और आय में असमानता
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि आय और रोजगार के क्षेत्र में असमानता महिलाओं की निवेश क्षमता को सीधे प्रभावित करती है। महिलाएं पुरुषों द्वारा कमाए गए हर ₹100 के मुकाबले औसतन ₹73 ही कमा पाती हैं। 60 प्रतिशत से अधिक महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, जहां आय अस्थिर होती है। कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी 41.7 प्रतिशत है, जबकि पुरुषों की 78.8 प्रतिशत। इस असमानता का प्रभाव निवेश के आंकड़ों में भी स्पष्ट दिखाई देता है।
निवेश में बड़ी खाई
रिपोर्ट के अनुसार, केवल 8.6 प्रतिशत महिलाएं म्यूचुअल फंड या इक्विटी जैसे निवेश साधनों में निवेश करती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 22.3 प्रतिशत है। म्यूचुअल फंड खातों में महिलाओं की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है। महिलाएं पुरुषों की तुलना में करीब पांच वर्ष बाद निवेश शुरू करती हैं। उनका पहला निवेश भी पुरुषों की तुलना में लगभग आधा होता है। रिटायरमेंट सुरक्षा के मामले में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। केवल 14.2 प्रतिशत महिलाओं के पास पेंशन या भविष्य निधि खाते हैं, जबकि पुरुषों में यह संख्या 32.8 प्रतिशत है।
रिपोर्ट बताती है कि भारत में केवल 21 प्रतिशत महिलाएं ही वित्तीय रूप से साक्षर हैं। यही कारण है कि देश में महिलाओं के पास पुरुषों की तुलना में सिर्फ 60 प्रतिशत सेवानिवृत्ति संपत्ति ही मौजूद है।
तकनीक और विशेष डिजाइन से मिल सकती है गति
Lxme की सह-संस्थापक प्रीति राठी गुप्ता का कहना है कि भारत ने वित्तीय समावेशन का मजबूत ढांचा तैयार किया है, लेकिन केवल पहुंच पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार जब महिलाओं को सही वातावरण, आत्मविश्वास, सामुदायिक सहयोग और उनकी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप बनाए गए वित्तीय उत्पाद मिलते हैं, तो वे बाजार में केवल भागीदारी ही नहीं करतीं बल्कि नेतृत्व भी कर सकती हैं।
इसी सोच के तहत Lxme ने वर्ष 2025 में एलएक्सएमई पे शुरू किया, जिसे महिलाओं के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया पहला यूपीआई अनुभव बताया गया। मंच के आंकड़े बताते हैं कि यदि वित्तीय सेवाएं महिलाओं के व्यवहार और जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की जाएं, तो वे लेनदेन से आगे बढ़कर निवेश की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाती हैं।
आर्थिक नीति के लिए भी अहम मुद्दा
EY इंडिया में वित्तीय सेवाओं के साझेदार सौरभ चंद्र के अनुसार, भारत ने वित्तीय समावेशन में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन वित्तीय प्रणाली को महिलाओं की जरूरतों के अनुरूप और अधिक संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। उनका कहना है कि ₹40 लाख करोड़ की संभावित आर्थिक वृद्धि केवल अनुमान नहीं है, बल्कि यह वह अवसर है जिसे महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को मजबूत करके हासिल किया जा सकता है।
केवल बैंक खाते खोलना आर्थिक समानता की दिशा में पर्याप्त नहीं है। महिलाओं को निवेश और संपत्ति निर्माण की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए नियामकों, बैंकों, वित्तीय तकनीकी कंपनियों और नीति निर्माताओं को मिलकर काम करना होगा।
यदि वित्तीय ढांचे को महिलाओं की आय, जीवनचक्र और निवेश व्यवहार को ध्यान में रखकर पुनः डिजाइन किया जाए, तो यह न केवल लैंगिक समानता को मजबूत करेगा बल्कि भारत की आर्थिक वृद्धि के अगले चरण को भी गति देगा।