नई दिल्ली : युद्ध के माहौल के बीच नई दिल्ली के ऊर्जा भंडार बढ़ने की कगार पर हैं! इसी वजह से राष्ट्रपति ट्रंप ने नई दिल्ली को 30 दिनों की ‘लाइफलाइन’ दी है। फिलहाल 4 अप्रैल तक तुलनात्मक रूप से कम कीमत पर नई दिल्ली को रूसी तेल खरीदने की इजाजत दी है।
शुक्रवार को अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह संदेश देने के बाद ही विपक्ष ने एक सुर में तीखी आलोचना शुरू कर दी थी। उनका दावा था कि ट्रंप के करीबी दोस्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की हालत इतनी खराब है कि संप्रभु भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार होने के बावजूद, कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष इस तरह अपनी उंगली के इशारे पर उसके तेल खरीदने की रूपरेखा तय कर सकता है।
हालांकि शनिवार को इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी। जहां ट्रंप की ‘सौजन्यपूर्ण’ अनुमति पर सीधे कोई टिप्पणी किए बिना एक लिखित बयान जारी की गई। केंद्र की ओर से दावा किया गया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव की स्थिति बनने के बावजूद भारत की ऊर्जा सप्लाई लाइन में कोई बाधा नहीं आई है।
पिछले एक दशक में भारत ने अपने तेल आयात के स्रोत 27 देशों से बढ़ाकर 40 देशों तक कर लिए हैं, ताकि किसी भी परिस्थिति में कई वैकल्पिक स्रोतों से तेल लाने की व्यवस्था की जा सके। राष्ट्रीय हित में भारत हमेशा प्रतिस्पर्धी और किफायती दाम पर तेल खरीदने के लिए तैयार है।
इसी के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति को परोक्ष संदेश देते हुए उस बयान में यह भी दावा किया गया कि किसी भी दबाव में आकर भारत ने कभी मॉस्को से तेल आयात बंद नहीं किया। इस महीने भी रूस भारत को तेल निर्यात करने वाला सबसे बड़ा एकल देश है।
पिछले 3 वर्षों से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के बावजूद भारत रूसी कच्चा तेल खरीदता रहा है। और निकट भविष्य में इस परंपरा के बदलने की कोई संभावना नहीं है।
इसी बीच अमेरिकी उप-विदेश सचिव क्रिस्टोफर लैंडाउ ने शुक्रवार को टिप्पणी की थी कि चीन के साथ व्यापारिक समझौते के मामले में उन्होंने अतीत में जो गलती की थी, भारत के मामले में वाशिंगटन उसकी पुनरावृत्ति नहीं करेगा।
उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शनिवार को कहा कि किसी भी देश की तरक्की और विकास का मतलब यह होता है कि वह देश अपने तय किए हुए रास्ते पर आगे बढ़े। भारत के मामले में भी यही बात लागू होती है। भारत अपने विकास का रास्ता खुद तय करेगा और यह उसके अपने सामर्थ्य और ताकत पर निर्भर करेगा, न कि किसी दूसरे देश की गलतियों या अनुभवों पर।
उनके इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि भारत अपने कूटनीतिक और व्यापारिक फैसले पूरी तरह स्वतंत्र रूप से लेता है और किसी बाहरी दबाव या सलाह के आधार पर अपनी नीतियां तय नहीं करता।