कोलकाताः विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर नलबन में आयोजित कार्यक्रम में राज्य सरकार की पर्यावरण नीति और शहरी विकास के प्रभावों पर गंभीर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरी निर्माण के कारण रिहायशी इलाके लगातार हरियाली खो रहे हैं और यह स्थिति “कंक्रीट के जंगल” जैसा स्वरूप ले रही है। उन्होंने इस बदलाव को भविष्य के लिए खतरे की घंटी बताया और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।
वृक्षारोपण अभियान और हरित लक्ष्य
इसी कार्यक्रम में राज्य सरकार ने ‘माँ के नाम पर एक पेड़’ अभियान की शुरुआत की। इसके तहत लगभग 6 लाख फलदार पौधे लगाए जा रहे हैं, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक जुड़ाव को भी बढ़ावा देंगे।
सरकार ने आगामी मानसून सीजन में कुल 1 करोड़ 10 लाख पौधे लगाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी तय किया है, जिसे राज्य में हरियाली बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
एक-तिहाई हरियाली नियम पर जोर
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने रिहायशी क्षेत्रों में लागू नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि भवन निर्माण योजनाओं में यह स्पष्ट प्रावधान है कि एक-तिहाई जमीन पर पेड़ लगाना अनिवार्य है।
उन्होंने चिंता जताई कि इस नियम का जमीनी स्तर पर पालन ठीक से नहीं हो रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी नियमित देखभाल भी जरूरी है, वरना यह प्रयास केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
जंगल संरक्षण, शिक्षा और स्वच्छता पर फोकस
उन्होंने जंगलमहल और तराई-दुआर क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि इससे पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ रहा है। इसके साथ ही उन्होंने पर्यावरण शिक्षा को मजबूत करने के लिए स्कूलों के पाठ्यक्रम में विशेष अध्याय जोड़ने की बात कही।
स्वच्छता को भी पर्यावरण संरक्षण का हिस्सा बताते हुए उन्होंने कालीघाट और दक्षिणेश्वर जैसे धार्मिक स्थलों की सफाई पर जोर दिया। कार्यक्रम के अंत में नलबन तालाब में मछली के बीज छोड़े गए, जिसे जल संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन के प्रतीकात्मक कदम के रूप में देखा गया।