नई दिल्ली/कोलकाता : कांग्रेस पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर अपने विकल्पों पर विचार कर रही है और पार्टी सूत्रों के अनुसार वह राज्य में विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का फैसला कर सकती है। अब तक वाम दलों के साथ किसी गठबंधन को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है।
सूत्रों ने बताया कि बंगाल कांग्रेस इकाई के कई नेता इस बात के पक्ष में हैं कि पार्टी चुनाव अकेले लड़े क्योंकि दशकों से अधिक समय तक अधिकांश चुनाव गठबंधन में लड़ने के कारण पार्टी कमजोर हुई है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा जहां पूरी तरह से चुनावी अभियान में उतर चुकी हैं, वहीं कांग्रेस की स्थिति को लेकर अब भी कोई स्पष्टता नहीं है।
सूत्रों के अनुसार पार्टी के आगामी चुनाव अपने दम पर लड़ने की संभावना है। पिछले चुनावों में वाम-कांग्रेस-इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) गठबंधनी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था और यह गठबंधन केवल एक सीट जीत सका था। भाजपा राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी, जबकि इससे पहले लंबे समय तक राज्य की राजनीति पर वाम दलों और कांग्रेस का दबदबा रहा था।
कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि बंगाल इकाई का एक वर्ग मानता है कि गठबंधन में रहकर पार्टी का विस्तार संभव नहीं है और जिन क्षेत्रों में पार्टी लंबे समय से चुनाव नहीं लड़ रही है, वहां उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। उनका मानना है कि मार्च-अप्रैल में संभावित विधानसभा चुनावों का उपयोग पार्टी को पूरे राज्य में अपना आधार मजबूत करने के लिए करना चाहिए।
केरल में भी इस वर्ष की पहली छमाही में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां वाम दल और कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता के मुख्य दावेदार रहे हैं। भाजपा ने अतीत में कांग्रेस पर बंगाल में वाम दलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने और केरल में उन्हीं के खिलाफ चुनाव लड़ने को लेकर तंज कसा है।कांग्रेस ने इस महीने की शुरुआत में वरिष्ठ नेता बीके हरिप्रसाद को पश्चिम बंगाल के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया था।
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है, जहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, वहीं आई-पैक परिसरों पर ईडी की छापेमारी भी चर्चा में है। कांग्रेस नेतृत्व द्वारा अगले कुछ दिनों में बंगाल में चुनावी रणनीति पर अंतिम फैसला लिए जाने की उम्मीद है।