कोलकाताः कोलकाता ने मंगलवार, 24 फरवरी 2026 को अपनी ट्राम सेवा की 153वीं वर्षगांठ मनाई। इस अवसर पर लकड़ी की हेरिटेज ट्राम ‘गीतांजलि’ ने गरियाहाट डिपो से अपनी विशेष यात्रा शुरू की। ट्राम एस्प्लेनेड होते हुए श्यामबाजार तक पहुंची, जिसमें लगभग 50 यात्री सवार थे। रास्ते में फूलों की वर्षा और शंखनाद के बीच शहर की गलियों का सफर पुराने समय की यादों को ताजा करता रहा।
‘गीतांजलि’ को 2014 में हेरिटेज ट्राम घोषित किया गया। यह नॉनापुकुर डिपो में सुरक्षित रखी जाती है और विशेष अवसरों पर इसे किराए पर लिया जा सकता है। ट्राम की यह यात्रा न केवल शहरवासियों के लिए उत्सव का अवसर थी, बल्कि कोलकाता की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का प्रतीक भी थी।
गौरवशाली इतिहास और तकनीकी बदलाव
कोलकाता में ट्राम सेवा की शुरुआत 1873 में घोड़ों द्वारा खिंची ट्राम से हुई थी। 1902 में इसे बिजली से चलने योग्य बनाया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, ‘गीतांजलि’ नॉनापुकुर कार्यशाला में ब्लैकआउट की स्थिति में मोमबत्ती की रोशनी में बनाई गई थी।
1960 के दशक में शहर में 37 ट्राम रूट और 340 से अधिक ट्रामें चलती थीं। यह समय शहर के लिए ट्राम नेटवर्क का स्वर्ण युग माना जाता है। हालांकि आज एशिया का सबसे पुराना ट्राम नेटवर्क होने के बावजूद, सक्रिय रूट केवल दो रह गए हैं-गारियाहाट-एस्प्लेनेड और एस्प्लेनेड-श्यामबाजार। यह बताता है कि समय बदल गया है, लेकिन शहर की सांस्कृतिक आत्मा अभी भी ट्राम की धड़कन में जीवित है।
वर्तमान स्थिति और सुरक्षा की चुनौतियां
आजकल शहर में ट्रामों की संख्या केवल 7-10 के आसपास रह गई है। पुराने ट्रैक, इंजन और लकड़ी की बॉडी यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय हैं। साग्निक गुप्ता, संयुक्त सचिव, कलकत्ता ट्राम यूजर्स एसोसिएशन का मानना है, “ट्राम सिर्फ प्रदर्शनी के लिए नहीं है। इसे नियमित निरीक्षण, रखरखाव और सुरक्षा उपायों के साथ चलाना चाहिए।”
विशेषज्ञों का मानना है कि WWII युग की लकड़ी की ट्राम को आधुनिक सुरक्षा मानकों पर चलाना चुनौतीपूर्ण है। शहर प्रशासन को विरासत और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। इससे ट्राम न केवल पुरानी यादों का प्रतीक बने बल्कि यात्रियों के लिए सुरक्षित भी रहे।
गीतांजलि के सफर के गवाह बने लोग। पीटीआई
ट्राम से पर्यावरण और यात्री दोनों खुश
ट्राम न केवल शहर की विरासत का प्रतीक है, बल्कि प्रदूषण-मुक्त और शांतिपूर्ण यात्रा का बेहतरीन उदाहरण भी है। इसकी धीमी रफ्तार, लकड़ी की बनावट और पुराने ट्रैक शहर की व्यस्तता में ठहराव का अहसास कराते हैं।
विशेषज्ञ और पर्यावरण समर्थक मानते हैं कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संरक्षित करना बेहद जरूरी है। प्रशासन को पुराने ट्रामों और नेटवर्क को संरक्षित रखते हुए सुरक्षा, ट्रैक सुधार और आधुनिक सुविधाओं पर ध्यान देना होगा। यह सुनिश्चित करेगा कि विरासत और सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहे और शहरवासियों के लिए यह सफर अनुभवपूर्ण और सुरक्षित रहे।
विरासत और आधुनिकता का संगम
‘गीतांजलि’ का सफर सिर्फ ट्रैक पर नहीं, बल्कि शहरवासियों के दिलों में भी हमेशा जीवित रहेगा। यह ट्राम हमें याद दिलाती है कि पुराने रास्तों, पुरानी यादों और सांस्कृतिक विरासत को संजोना कितना जरूरी है।
यदि नियमित निरीक्षण और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएं, तो ट्राम शहर की धड़कन और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का प्रतीक बन सकती है। यह सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि कोलकाता की पहचान और सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत स्वरूप है।