नई दिल्ली/कोलकाताः सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इलेक्शन कमीशन ने ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ यानी तार्किक अंतर वाली वोटर लिस्ट को लेकर बड़ा कदम उठाया है। चुनाव आयोग ने बुधवार शाम नोटिफिकेशन जारी कर साफ किया है कि यह लिस्ट आगामी शनिवार, 24 जनवरी तक सार्वजनिक कर दी जाएगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि उम्र के प्रमाण के तौर पर माध्यमिक परीक्षा का एडमिट कार्ड भी मान्य दस्तावेज होगा।
चुनाव आयोग ने इस संबंध में राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को पत्र भेजकर निर्देश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार लॉजिकल अंतर वाली लिस्ट को तय समयसीमा के भीतर पब्लिक डोमेन में रखा जाए। आयोग ने कहा है कि यह सूची ग्राम पंचायत, ब्लॉक कार्यालय, वार्ड ऑफिस और अन्य आबादी वाले सार्वजनिक स्थानों पर लगाई जाए ताकि आम मतदाताओं को इसे देखने में कोई परेशानी न हो।
लिस्ट में नाम आने पर क्या करना होगा?
जिन मतदाताओं के नाम लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट में शामिल होंगे, उन्हें 10 दिन का समय दिया जाएगा। इस दौरान उन्हें अपने जरूरी दस्तावेज जमा करने होंगे। डॉक्यूमेंट्स जमा करने पर चुनाव आयोग की ओर से रसीद दी जाएगी। इसके बाद सुनवाई की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें संबंधित वोटर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। आवश्यकता पड़ने पर वे वकील या बूथ लेवल एजेंट (BLA) की मदद भी ले सकते हैं।
इलेक्शन कमीशन ने स्पष्ट किया है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की सुनवाई प्रक्रिया पहले की तरह जारी रहेगी और उसे रोका नहीं जाएगा। यदि किसी वोटर ने पहले ही दस्तावेज जमा कर दिए हैं और बाद में उसका नाम लॉजिकल अंतर वाली लिस्ट में आता है तो घबराने की जरूरत नहीं है। सभी दस्तावेज BLO ऐप पर सुरक्षित रहेंगे।
किन कारणों से नाम डाले गए हैं लिस्ट में
आयोग के मुताबिक, जिन मतदाताओं के नाम की स्पेलिंग में गड़बड़ी है, उम्र से जुड़े रिकॉर्ड में अंतर है या पारिवारिक विवरण में त्रुटि है, उन्हीं को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट में शामिल किया गया है। यदि माध्यमिक एडमिट कार्ड में जन्मतिथि दर्ज है, तो उसे भी वैध प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
राजनीतिक विवाद और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही सवाल उठा चुकी हैं। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी कई जनसभाओं में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट सार्वजनिक करने की मांग की थी। उनका दावा था कि इस आधार पर करीब 1 करोड़ 36 लाख मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश की जा रही है।
तृणमूल कांग्रेस ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया था। इसके बाद सोमवार को शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को आदेश दिया कि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी से जुड़ी पूरी लिस्ट सार्वजनिक की जाए और इसे स्थानीय स्तर के सरकारी दफ्तरों में प्रदर्शित किया जाए। कोर्ट के आदेश के बाद अभिषेक बनर्जी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि आज मैं कोर्ट में हारा हूं, लेकिन अप्रैल के चुनाव में भाजपा को हार मिलेगी।