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दौड़-भाग के बीच में विराम लेना भी है जरूरी, CJI सूर्य कांत ने युवा वकीलों को क्यों दी यह हिदायत?

CJI सूर्य कांत ने युवा वकीलों से पेशे के दबाव में वास्तविक जीवन में न खोने की हिदायत दी।

By Joy Saha, Posted By : Moumita Bhattacharya

Jan 19, 2026 11:07 IST

कानून का मतलब सिर्फ मोटी-मोटी फाइलें, कानूनी दांव-पेंच और अदालत व खंडपीठ में पेश की जाने वाली दलीलें और इसके साथ ही रातों की नींद उड़ाकर सबूत व गवाह इकट्ठा करना...आम तौर पर एक वकील का जीवन यहीं समझा जाता है। लेकिन इसके बाहर भी वकीलों की एक नयी जीवन धारा हो सकती है। यहीं पाठ मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने दिया।

रविवार को कोलकाता के कानून विश्वविद्यालय के दिक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने पहुंचे CJI सूर्य कांत ने युवा वकीलों से पेशे के दबाव में वास्तविक जीवन में न खोने की हिदायत दी। उन्होंने कहा कि बीच में कभी-कभी थोड़ा रुककर चैन की सांस लेना भी पेशेवरों की असली शक्ति को बढ़ाता है।

उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा, 'ब्रेक लेने का मतलब भाग जाना नहीं बल्कि और भी समझदारी के साथ वापसी करना होता है।'

CJI सूर्य कांत कहते हैं कि आज के समय में बड़ी संख्या में युवा पेशेवर समझते हैं कि हर समय व्यस्त रहना ही सफलता की कुंजी है। लेकिन लगातार चल रहे इस भागदौड़ के बीच अपने मानसिक स्वास्थ्य को नजरंदाज करना भी ठीक नहीं होता है। उन्होंने कहा कि जो पेशा समाज की रक्षा करता है, उससे जुड़े लोगों को मानसिक रूप से स्वास्थ्य और स्थितिशील रहना बेहद जरूरी होता है।

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कानूनी लड़ाइयों के बीच अगर कभी-कभी थोड़ा विराम लिया जाए तो उसका फायदा काफी गहरा और फलदायक भी होता है। युवा पेशेवरों को दी गयी अपनी सलाह में उन्होंने कहा कि सही समय पर अपनी गति में कमी लाना पेशेवर जिम्मेदारियों से पीछे हटना नहीं बल्कि यह कानून के पेशे में लंबे समय तक जमे रहने में मदद करता है।

इस दौरान उन्होंने विश्वविद्यालय की पढ़ाई और वास्तविक अदालत में होने वाली बहस के बीच का फर्क भी समझाया। युवा ग्रेजुएट्स को समझाते हुए उन्होंने कहा, 'किताबों की तुलना में फाइल का वजन ज्यादा होगा, क्लासरुम की बहस से अदालत के फैसले ज्यादा अनिश्चित होंगे। ऐसे कठिन समय में मेधा से ज्यादा विवेक-बुद्धि काम आएगी।'

ज्ञान भले ही किताबों से मिलता हो लेकिन विवेक व बुद्धि अनुभव व गलतियों से मिल पाता है। उनका मानना है कि कौन सी बात पर बहस करना चाहिए और कहां चुप रहना चाहिए, अगर कोई इतना ही समझ लेता है तो वह सामान्य वकील से सफल वकील तक की दूरी तय कर लेगा।

दिक्षांत समारोह में वह थोड़ी देर से पहुंच पाए थे, जिसे लेकर उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि छात्रों ने अदालत में काम शुरू कर दिया है। इसलिए यह समारोह देर से नहीं बल्कि सही समय पर ही शुरू हुआ। इसके साथ ही उन्होंने युवा वकीलों से कहा कि डिग्री पाने का मतलब ही सब कुछ जान लेना नहीं होता है बल्कि यह जीवन भर सीखने का एक लाइसेंस मात्र है।

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