कोलकाता: बजट की मंजूरी न मिलना हो या पिछले कुछ महीनों से उनकी विवादित विदेश नीति के कारण विरोध प्रदर्शन की आशंका असल वजह चाहे जो भी हो 49वें कोलकाता अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में इस बार अमेरिका का पवेलियन दिखाई नहीं देगा। पुस्तक मेले की आयोजक संस्था पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड की ओर से बताया गया है कि यूएस इंफॉर्मेशन सर्विस या अमेरिकन सेंटर के कोलकाता कार्यालय ने ई-मेल के माध्यम से गिल्ड को सूचित किया है कि 2026 के पुस्तक मेले में वे कोई पवेलियन नहीं बनाएंगे। कारण के तौर पर बताया गया है कि अमेरिका में पुस्तक मेले से संबंधित बजट को मंजूरी नहीं मिल पाई।
दूसरी ओर इस साल पहली बार पुस्तक मेले में यूक्रेन का पवेलियन देखने को मिलेगा। पुस्तक प्रेमियों के एक वर्ग के बीच यूक्रेन की लोककथाएँ और वहाँ का साहित्य काफी लोकप्रिय हैं। इसलिए पहली बार पुस्तक मेले में यूक्रेन का पवेलियन मिलने पर कोलकाता बेहद खुश है।
तीन दिन बाद कोलकाता पुस्तक मेले का उद्घाटन होने जा रहा है। जो लोग किताबों से प्रेम करते हैं उनमें से कई पूरे साल इस समय के लिए किताबें खरीदने के वास्ते पैसे बचाते हैं। इस वर्ष 49वें कोलकाता अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में एक हजार से ज्यादा पुस्तक स्टॉल होंगे यह जानकारी पहले ही मेले की मुख्य आयोजक संस्था पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड ने दी थी। साथ ही गिल्ड ने बताया था कि 2026 के कोलकाता पुस्तक मेले में 20 देशों के पवेलियन होंगे लेकिन इस सूची में इस बार अमेरिका का नाम नहीं है।
कोलकाता पुस्तक मेले में पहली बार यूएसए का पवेलियन 2006 में देखा गया था। उसके पाँच साल बाद यानी 2011 में अमेरिका को ‘थीम कंट्री’ के रूप में चुनकर पुस्तक मेले का आयोजन किया गया था। उस वर्ष का पवेलियन वॉशिंगटन के कैपिटल बिल्डिंग की तर्ज पर बनाया गया था। कोलकाता अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में भाग लेने के बाद यह पहली बार है जब अमेरिका इस मेले से अनुपस्थित रहेगा।
गिल्ड के महासचिव ने क्या कहा?
इस घटना को पुस्तक प्रेमियों और मेले दोनों के लिए ही दुखद बताते हुए गिल्ड के महासचिव त्रिदिबकुमार चट्टोपाध्याय ने ‘एई समय’ से कहा कि इस बार अमेरिका का पवेलियन न होना निश्चित रूप से पुस्तक मेले के लिए नुकसान है। हम हमेशा चाहते हैं कि अमेरिका के साहित्यकार और वहाँ की सांस्कृतिक दुनिया से जुड़े लोग मेले में आएँ लेकिन इस बार उन्हें कुछ बजट से जुड़ी समस्याएँ हैं।
साथ ही उन्होंने कहा कि इस साल वे नहीं हैं इसका मतलब यह नहीं कि आगे भी नहीं रहेंगे। हमारे साथ उनकी विस्तृत बातचीत हुई है। समस्या अस्थायी है।
अमेरिकन सेंटर के सूत्रों के अनुसार 2025 में अमेरिका में एक महीने तक प्रशासनिक ‘शटडाउन’ चला था। संयोग से उसी समय पुस्तक मेले से संबंधित बजट की मंजूरी होनी थी लेकिन शटडाउन के कारण ऐसा नहीं हो पाया। यह भी बताया गया है कि सिर्फ कोलकाता अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले से ही नहीं बल्कि हाल ही में अमेरिका ने कुल 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से खुद को अलग कर लिया है। इनमें संयुक्त राष्ट्र के अधीन 31 संस्थाएँ भी शामिल हैं। इन 66 संगठनों में से कई पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और प्रवासन जैसे विषयों पर काम करते हैं।
क्या इसके पीछे विश्व राजनीति का तनाव कारण है?
हालाँकि पुस्तक प्रेमियों का एक वर्ग मानता है कि पिछले कुछ महीनों में जिस तरह अमेरिका की विदेश नीति ने कभी वेनेजुएला, कभी ईरान और कभी ग्रीनलैंड को लेकर पूरी दुनिया में विवाद खड़ा किया है उससे पुस्तक मेले में अमेरिका का पवेलियन होने पर उसके सामने विरोध प्रदर्शन की आशंका काफी ज्यादा थी। संभव है कि इसी आशंका के चलते इस बार मेले से दूर रहने का फैसला वहाँ के अधिकारियों ने लिया हो।
पहली बार होगा यूक्रेन का स्टॉल
हालाँकि इस साल कोलकाता के पुस्तक प्रेमियों को मिलने वाली उपलब्धि भी कम नहीं है। पूर्वी यूरोप के साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए तारास शेवचेंको या लेसिया यूक्राइनिका की कविताएँ अच्छी तरह जानी-पहचानी हैं। सेरही झादान, ओक्साना जाबुझको और आंद्रेई कुर्कोव की साहित्यिक कृतियाँ भी अनजानी नहीं हैं ये सभी यूक्रेन के साहित्यकार हैं। इस बार पुस्तक मेले में इनके लिखे हुए पुस्तकें और यूक्रेन की कला व साहित्य से जुड़ी जानकारियाँ सीधे उसी देश के पवेलियन से मिल सकेंगी।