कोलकाता: हाल ही में एक सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक चूल्हे के उपयोग तथा मोटरों के आधुनीकरण जैसे तुलनात्मक रूप से कम खर्च वाले कदमों से राज्य के लघु और मध्यम उद्योग क्षेत्रों में ईंधन खर्च और प्रदूषण—दोनों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
‘एनर्जी असेसमेंट ऑफ एमएसएमई माइक्रो-क्लस्टर्स इन वेस्ट बंगाल’ शीर्षक वाली सर्वेक्षण का संयुक्त रूप से संचालन इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर एंड बिजनेस मैनेजमेंट (IISWBM) और असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स ने किया। यह सर्वेक्षण हावड़ा और दक्षिण 24 परगना के औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित 15 छोटे उद्योग कारखानों पर किया गया।
अनुसंधान में चांदी की कलाकारी, इंजीनियरिंग, गैल्वनाइजिंग और उसके उत्पादन—इन चार क्षेत्रों के उद्योगों में ईंधन के उपयोग और कार्बन की मात्रा बढ़ने के स्रोतों का विश्लेषण किया गया है। सर्वे में देखा गया कि अधिकांश कारखानों में जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता है। साथ ही, पुराने और अक्षम भट्टियों, कम दक्ष मोटरों और ईंधन उपयोग की नियमित निगरानी की कमी से उत्पादन लागत बढ़ रही है और अनावश्यक प्रदूषण हो रहा है।
सर्वेक्षण दल की सिफारिश है कि पावर फैक्टर सुधार और लोड प्रबंधन के माध्यम से मोटरों का आधुनिकीकरण और कारखाने की छत पर सौर ऊर्जा पैनलों की स्थापना जैसे कदम उठाने की आवश्यकता है। इससे मुख्य ग्रिड से बिजली खरीदने की लागत कम हो जाएगी। दक्षिण 24 परगना के मगराहाट क्षेत्र में रूपोरा हस्तकला उद्योग का एक उदाहरण दिया गया है, जहां आधुनिक प्रबंधन प्रणाली और मौजूदा विद्युत भट्टियों के कुशल उपयोग से ईंधन की लागत में उल्लेखनीय कमी संभव हुई। शोधकर्ताओं का दावा है कि इस प्रकार के निवेश से कारखानों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव नहीं पड़ता और अधिकांश मामलों में निवेश की लागत थोड़े समय में पूरी हो जाती है।
एमएसएमई विभाग के संयुक्त निदेशक मौ सेन ने कहा, 'ईंधन की बचत और स्वच्छ तकनीक का उपयोग अब विकल्प नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी बाजार में टिके रहने की शर्त है। औद्योगिक क्षेत्र आधारित इस सर्वेक्षण से वास्तविक समस्याओं के समाधान में मदद मिलेगी।' IISWBM के निदेशक कष्णमुरारी अग्रवाल ने कहा, 'लघु और मध्यम उद्योगों में प्रदूषण घटाने की प्रक्रिया महंगी होने की जरूरत नहीं है। कुछ व्यावहारिक बदलाव आवश्यक हैं।'