अहमदनगर : अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को शुक्रवार को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। दिल्ली की सत्ता पहले ही पार्टी के हाथ से जा चुकी थी और अब संगठनात्मक स्तर पर भी भारी टूट की स्थिति बन गई है। राघव चड्ढा के साथ-साथ राज्यसभा के छह अन्य सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में जाने की चर्चा के बाद पार्टी की स्थिति और कमजोर हो गई है। इस घटनाक्रम के बाद राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसदों की संख्या 10 से घटकर सिर्फ 3 रह गई है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अन्ना हजारे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
शुक्रवार को महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे ने कहा कि आम आदमी पार्टी सही दिशा में नहीं चली। उन्होंने संकेत दिया कि यदि पार्टी सही रास्ते पर होती तो राघव चड्ढा और अन्य सांसदों का दल छोड़ना संभव नहीं था। अन्ना हजारे ने कहा आम आदमी पार्टी छोड़ने के पीछे निश्चित रूप से कोई न कोई कारण होगा। लोकतंत्र में हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है। किसी व्यक्ति का कहां रहना है और कहां से बाहर निकलना है यह उसका अपना दृष्टिकोण होता है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि राघव चड्ढा और अन्य सांसदों के पार्टी छोड़ने की जिम्मेदारी सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी के नेतृत्व यानी अरविंद केजरीवाल पर आती है। अन्ना हजारे ने कहा वे चड्ढा और अन्य निश्चित रूप से आम आदमी पार्टी के भीतर किसी समस्या का सामना कर रहे होंगे इसी कारण उन्होंने पार्टी छोड़ी। यह नेतृत्व की गलती है। यदि पार्टी सही दिशा में चल रही होती तो वे कभी पार्टी नहीं छोड़ते।
इससे पहले ही दिल्ली में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने एक पत्रकार वार्ता में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी से अलग होने और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होने की घोषणा की थी। राघव चड्ढा ने दावा किया कि आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों में से दो-तिहाई ने पार्टी छोड़ दी है और अब वे एक अलग समूह के रूप में काम करेंगे। राघव चड्ढा के नेतृत्व में हुआ यह बड़ा दल-बदल आम आदमी पार्टी के लिए गंभीर झटका माना जा रहा है। यह पार्टी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की पृष्ठभूमि से 2012 में अस्तित्व में आई थी और देखते ही देखते दिल्ली तथा पंजाब में सत्ता तक पहुंच गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान संकट आम आदमी पार्टी के इतिहास का सबसे बड़ा संगठनात्मक संकट है।