कोलकाताः पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की स्क्रूटिनी को लेकर चुनाव आयोग के भीतर गंभीर चिंता सामने आई है। ‘विचाराधीन’ सूची में शामिल करीब 60 लाख नामों में से केवल 33 लाख को ही अंतिम वोटर लिस्ट में शामिल किया गया है। औसतन लगभग 45 प्रतिशत नाम जांच के दौरान हटा दिए गए।
लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में नाम हटाने की दर सिर्फ 0 से 5 प्रतिशत के बीच रही, जिससे आयोग को संदेह हुआ कि जांच प्रक्रिया हर जगह एक जैसी नहीं अपनाई गई।
जांच प्रक्रिया और अधिकारियों पर सवाल
सूत्रों के मुताबिक, ऐसे 17 से 19 ज्यूडिशियल अधिकारियों की पहचान की गई है, जहां बेहद कम नाम हटाए गए। आयोग का मानना है कि कई मामलों में आधार और पैन कार्ड के आधार पर नाम तो जोड़ दिए गए, लेकिन उनकी वैधता की ठीक से जांच नहीं हुई।
कुछ जगह तो लगभग किसी भी नाम को नहीं हटाया गया, जिसे आयोग ने प्रक्रिया में गंभीर ‘त्रुटि’ माना है। इस मुद्दे को लेकर न्यायपालिका का ध्यान भी आकर्षित किया गया है, हालांकि अभी तक स्पष्ट जवाब नहीं मिला है।
वोटर लिस्ट की पारदर्शिता पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट में हालिया सुनवाई के दौरान यह संकेत दिया गया कि मतदाता सूची एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें समय-समय पर नाम जुड़ते और हटते रहते हैं।
अब चुनाव आयोग इस बात पर विचार कर रहा है कि जिन क्षेत्रों में गड़बड़ी पाई गई है, वहां मामलों को रिटायर्ड जजों के ट्राइब्यूनल को भेजा जाए या नहीं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नए कानूनी विवाद भी पैदा हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, इस पूरे मामले ने वोटर लिस्ट की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।