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पश्चिम बंगाल में “अघोषित राष्ट्रपति शासन”? ममता बनर्जी ने केंद्र पर लगाए गंभीर आरोप

मुख्यमंत्री ने बताया कि चुनाव आयोग के सामने उन्होंने ये चिंताएं कई बार जताई, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला

By राखी मल्लिक

Mar 20, 2026 20:03 IST

शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र के लॉन्च के दौरान ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने प्रधानमंत्री और भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर प्रशासनिक हस्तक्षेप का आरोप लगाया। चुनाव के समय शासन व्यवस्था को लेकर उन्होनें चिंता जताई।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में “अघोषित राष्ट्रपति शासन” की ओर बढ़ने का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार पर राज्य को अस्थिर करने और हथियारों की तस्करी जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों से कुछ ताकतें राज्य में पैसा और हथियार लाकर अशांति और दंगे भड़काने की कोशिश कर रही हैं। जिससे अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति बन सके। उन्होंने राज्य के लोगों से एकजुट रहने और शांति तथा लोकतंत्र की रक्षा करने की अपील की।

मुख्यमंत्री ने कहा, 'मेरी बंगाल के लोगों से अपील है कि एकजुट और सतर्क रहें। डर के आगे न झुकें और किसी भी तरह के लालच या प्रलोभन को स्वीकार न करें। कुछ ताकतें राज्य को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं। हमने विकास के अपने सभी वादे पूरे किए हैं, अब राज्य की एकता की रक्षा करना जनता की जिम्मेदारी है।’

उन्होंने वर्तमान स्थिति को “अघोषित राष्ट्रपति शासन” का प्रत्यक्ष रूप बताते हुए कहा कि इससे शासन और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं, खासकर चुनाव के समय। उनके अनुसार लोगों में यह धारणा बन रही है कि प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है और जनहित की नीतियों की कमी है।

ममता बनर्जी ने सभी नागरिकों से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए जागरूक और जिम्मेदार रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि उनका शासन सभी धर्मों—हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई को समान मानता है और विभाजनकारी राजनीति को अस्वीकार करता है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों को महिलाओं का विरोधी और एकतरफा बताया।

मुख्यमंत्री का यह भी आरोप है कि विभिन्न विभागों के कई प्रधान सचिवों को पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया गया है, जबकि वे स्थानीय परिस्थितियों से परिचित नहीं हैं। इससे जिम्मेदारी तय करने में कठिनाई हो सकती है।

नीतिगत मुद्दों पर केंद्र को घेरते हुए उन्होंने एनआरसी और संभावित परिसीमन (डिलिमिटेशन) को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि इन कारणों से जनता में असंतोष बढ़ा है। उनके अनुसार निर्णय प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है और कुछ ही शीर्ष नेता अधिकांश फैसले ले रहे हैं। जिससे विभाजन की भावना पैदा होती है।

उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान प्रशासनिक फेरबदल सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन इस बार बदलाव का पैमाना और प्रकृति चरम पर है, जिससे व्यवस्था प्रभावित हुई है।

पश्चिम बंगाल में दो चरणों में चुनाव 23 और 29 अप्रैल को होंगे, जबकि मतगणना 4 मई को निर्धारित है। इससे एक दिन पहले ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने 'मर्यादा और संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन' किया है।

अपने पत्र में उन्होंने 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' के दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर पक्षपातपूर्ण रवैये का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग के सामने उन्होंने ये चिंताएं कई बार जताई, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। इस वजह से उन्हें लोकतांत्रिक और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा।

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