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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी का करियर चुनना ‘क्रूरता’ या ‘परित्याग’ नहीं, महिला के लिए करियर उसका हक

अदालत ने कहा- "शिक्षित महिला की पेशेवर पहचान पति की इच्छा के अधीन नहीं हो सकती”

By डॉ. अभिज्ञात

May 12, 2026 20:34 IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी शिक्षित महिला द्वारा अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के लिए सुरक्षित व स्थिर माहौल सुनिश्चित करने के फैसले को क्रूरता या परित्याग नहीं कहा जा सकता।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता के पीठ ने कहा कि पारिवारिक अदालत द्वारा एक दंत चिकित्सक महिला के पेशेवर करियर को क्रूरता और परित्याग मानना सामंती सोच, पिछड़ा और अत्यधिक रूढ़िवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। गुजरात हाईकोर्ट ने भी पारिवारिक अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को रद्द करते हुए कहा कि पत्नी की पेशेवर पहचान किसी अप्रत्यक्ष वैवाहिक वीटो के अधीन नहीं हो सकती। अदालत ने पति और पत्नी दोनों की अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह भी ध्यान में रखा कि महिला अब वैवाहिक संबंध सुधारने की इच्छुक नहीं है। अदालत ने विवाह के अपरिवर्तनीय रूप से टूट जाने के आधार पर तलाक के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन इसे पत्नी की कथित क्रूरता या परित्याग से नहीं जोड़ा।

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि पति ने दोबारा विवाह कर लिया है और पत्नी के खिलाफ कथित झूठी गवाही के मामले में कार्रवाई की मांग को खारिज कर दिया। हालांकि अदालत ने महिला के खिलाफ पारिवारिक अदालत द्वारा की गई टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाते हुए कड़ी आपत्ति जताई।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने फैसले में कहा कि “हम 21वीं सदी में हैं, फिर भी एक योग्य महिला द्वारा अपने पेशेवर जीवन को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के पालन-पोषण के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने को निचली अदालतों ने क्रूरता और परित्याग मान लिया।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अहमदाबाद में अपना डेंटल क्लिनिक स्थापित करने के महिला के प्रयास को केवल इसलिए गलत माना गया क्योंकि उसने अपने पति और ससुराल पक्ष की उस अपेक्षा को स्वीकार नहीं किया कि वह पति के साथ उसकी सेना की पोस्टिंग वाले दूरस्थ क्षेत्र में जाकर रहे। अदालत ने कहा कि महिला ने वर्षों की मेहनत से अपनी पेशेवर योग्यता हासिल की थी और उसे व्यर्थ जाने देने के बजाय उसने अपने करियर को जारी रखने का फैसला किया।

अदालत ने कहा कि निचली अदालतों की सोच इस धारणा पर आधारित थी कि पत्नी की पेशेवर पहचान पति की इच्छा के अधीन है और उसे अपने पति की नौकरी तथा पोस्टिंग के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसी धारणाएं पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी सोच को दर्शाती हैं, जो आधुनिक समाज की प्रगतिशील सोच के अनुकूल नहीं हैं, जहां महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता और समान भागीदारी को मूलभूत महत्व दिया जा रहा है।

पीठ ने कहा कि एक शिक्षित और पेशेवर महिला को केवल वैवाहिक जिम्मेदारियों तक सीमित रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। विवाह उसकी व्यक्तिगत पहचान को समाप्त नहीं करता और न ही उसकी पहचान को उसके पति की पहचान के अधीन बना देता है। अदालत ने कहा कि पति और पत्नी दोनों की जिम्मेदारी है कि वे एक-दूसरे की आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए वैवाहिक संबंधों को संतुलित करें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बदलते वैवाहिक कानून और सामाजिक सोच में महिला को पति के परिवार का मात्र एक हिस्सा मानकर नहीं देखा जा सकता। उसकी स्वतंत्र बौद्धिक और पेशेवर पहचान तथा उसकी महत्वाकांक्षाओं को उचित सम्मान मिलना चाहिए। अदालत ने कहा कि जिसे अवज्ञा बताया गया, वह वास्तव में महिला की स्वतंत्रता का प्रदर्शन था, जबकि जिसे परित्याग कहा गया, वह पेशेवर जिम्मेदारियों, नाबालिग बच्ची के हित और जीवन की परिस्थितियों का परिणाम था।

यह मामला एक दंत चिकित्सक महिला और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल पद पर तैनात उसके पति के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। वर्ष 2009 में विवाह के बाद महिला ने पुणे में अपनी निजी प्रैक्टिस छोड़कर कारगिल में पति के साथ रहना स्वीकार किया था। बाद में गर्भावस्था और उनकी बेटी को दौरे पड़ने जैसी चिकित्सकीय समस्याओं के कारण महिला अहमदाबाद चली गई ताकि बच्ची को बेहतर चिकित्सा सुविधा और स्थिर माहौल मिल सके। वहीं उसने अपना डेंटल क्लिनिक भी शुरू किया।

पारिवारिक अदालत और बाद में गुजरात हाईकोर्ट ने यह कहते हुए पति को तलाक दे दिया था कि पत्नी का कर्तव्य है कि वह जहां पति की पोस्टिंग हो, वहीं रहे और उसने वैवाहिक जिम्मेदारियों से ऊपर अपने करियर को प्राथमिकता दी। सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को अस्वीकार करते हुए निचली अदालतों के दृष्टिकोण को गलत ठहराया।

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