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पाकिस्तान में कम उम्र में ही जिहादी बनाने की साजिश! प्रशिक्षण के लिए ‘स्कूल’ बना रहे जैश और लश्कर

बच्चों और किशोरों के लिए विशेष ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं लश्कर और जैश

नयी दिल्लीः पाकिस्तान की जमीन पर आतंकियों को तैयार करने की ‘फैक्ट्री’ होने की बात नई नहीं है। बचपन या किशोरावस्था में ही घर से बच्चों को उठाकर लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद के कैंपों में ब्रेनवॉश और हथियार चलाने की ट्रेनिंग लंबे समय से दी जा रही है। ऐसे ही ट्रेनिंग कैंपों का परिणाम 26/11 मुंबई हमले में पकड़े गए अजमल आमिर कसाब जैसे आतंकी हैं।

हाल ही में खुफिया एजेंसियों के हाथ लगी रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में बच्चों और किशोरों के लिए विशेष ट्रेनिंग कैंप शुरू किए गए हैं, लेकिन इस बार तरीका अलग है।

अब सीधे आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप नहीं, बल्कि कागजों पर ‘स्कूल’ बनाकर यह काम किया जा रहा है। पाकिस्तान के कई शहरों, खासकर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में हाल ही में कई पोस्टर देखे गए हैं। इनमें ‘बोर्डिंग स्कूल’ का प्रचार किया गया है। अभिभावकों से कहा जा रहा है कि वे अपने बच्चों को बिना किसी खर्च के इन स्कूलों में भेजें।

इतना ही नहीं, खुफिया सूत्रों के अनुसार जिन परिवारों के बच्चे इन ‘स्कूलों’ में भेजे जाएंगे, उन्हें आर्थिक सहायता देने का भी वादा किया गया है। खास तौर पर 7 से 13 साल के बच्चों को दाखिला देने पर जोर दिया जा रहा है। इन बच्चों को मुफ्त रहने-खाने के साथ-साथ मासिक भत्ता देने की भी घोषणा की गई है।

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, बहावलपुर, मुरिदके, लाहौर और कराची में ऐसे स्कूल खोले जा रहे हैं।

उनका कहना है कि जिस समय ये विज्ञापन दिए जा रहे हैं, वह बेहद महत्वपूर्ण है। गरीब परिवारों से भर्ती करना आतंकवादी संगठनों के लिए नया नहीं है, लेकिन इस समय हालात ऐसे हैं कि उन्हें खुद जाकर भर्ती नहीं करनी पड़ रही-अभिभावक खुद ही अपने बच्चों को इन ‘स्कूलों’ में भेज रहे हैं।

इसका कारण पाकिस्तान की खराब आर्थिक स्थिति है। देश पहले ही कर्ज में डूबा हुआ है और आम लोगों की हालत बेहद खराब है। ऊपर से ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध ने स्थिति और बिगाड़ दी है। तेल की कमी, पैसे की कमी, नौकरी और व्यापार का अभाव—यहां तक कि बाजार में चावल और आटे की भी भारी कमी है।

खुफिया एजेंसियों का कहना है कि ऐसे संकट में गरीब परिवारों के लिए बच्चों के भोजन और देखभाल की गारंटी देने वाले ये ‘स्कूल’ किसी वरदान जैसे लग रहे हैं।

खुफिया जानकारी के अनुसार, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में काफी हद तक तबाह हो चुके पीओके के आतंकी कैंपों को फिर से खड़ा करने की कोशिश लश्कर और जैश कर रहे हैं। इसमें उन्हें पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का समर्थन मिल रहा है।

हालांकि, पीओके के कुछ इलाकों में पाकिस्तान विरोधी आवाजें बढ़ रही हैं। खुफिया एजेंसियों के अनुसार, इन विरोधों को दबाने के लिए गरीबी को हथियार बनाया जा रहा है। इसी कारण पीओके से बच्चों को इन ‘स्कूलों’ में भेजने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।

खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक पीओके के कई इलाकों में कश्मीर विरोधी नारे अब पहले की तरह असर नहीं कर रहे। वहां के कई लोग ‘कश्मीर मुद्दे’ से दूरी बना रहे हैं। कुछ जगहों पर पाकिस्तानी सेना को विरोध का सामना भी करना पड़ा है-उनके काफिलों पर पत्थरबाजी तक हुई है।

कोटली, रावलकोट, मीरपुर और भीमबर जैसे शहरों में लोगों ने सभाएं कर आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप हटाने की मांग की है। इसका परिणाम यह है कि पीओके से भर्ती करना आतंकवादी संगठनों के लिए मुश्किल होता जा रहा है और भर्ती की संख्या भी तेजी से घट रही है।

इसी वजह से पीओके पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

सिर्फ अपने स्कूल खोलने तक ही सीमित नहीं, बल्कि खुफिया सूत्रों के अनुसार अब लश्कर और जैश के नेता पाकिस्तान के सरकारी और निजी स्कूलों में भी नियमित रूप से जा रहे हैं। वहां वे छात्रों के सामने भारत विरोधी भाषण दे रहे हैं और आतंकियों को ‘जिहादी’ बताकर महिमामंडित कर रहे हैं।

स्कूलों में कश्मीर में मारे गए आतंकियों की तस्वीरें दिखाकर ‘गो ऐज़ यू लाइक’ कार्यक्रम में उसी तरह वेशभूषा करने को कहा जा रहा है। कश्मीर के नाम पर ‘जिहाद’ की शिक्षा दी जा रही है।

खुफिया सूत्रों का दावा है कि स्कूल स्तर से आतंकियों को तैयार करने की यह योजना पिछले साल सितंबर में बनाई गई थी, जिसे अब तेजी से लागू किया जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक इस योजना में जैश, लश्कर से आगे है। लश्कर मुख्य रूप से पीओके में अपने स्कूलों पर ध्यान दे रहा है, जबकि जैश पूरे पाकिस्तान के स्कूलों में इस ‘पाठ्यक्रम’ को फैलाने का काम कर रहा है—साथ ही उसके अपने स्कूल भी चल रहे हैं।

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