कागजी योजनाओं और केवल चिकित्सकों तक सीमित चर्चाओं से बाहर निकलकर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी एएमआर की रोकथाम के लिए जनभागीदारी को केंद्र में लाने की पहल की गई है। इसी उद्देश्य से राज्य के एक समूह के डॉक्टर और शोधकर्ताओं ने समाज की सक्रिय भागीदारी के जरिए एएमआर से लड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
बिना जरूरत और अत्यधिक एंटीबायोटिक उपयोग के कारण पैदा हुई एएमआर आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। ऐसे में अस्पतालों और नीतिगत दस्तावेजों की सीमाओं से बाहर निकलकर समाज के भीतर से समाधान तलाशने की कोशिश की गई। शोध में साफ तौर पर सामने आया कि स्कूल, परिवार और आम लोगों की सक्रिय भागीदारी के बिना एएमआर की रोकथाम संभव नहीं है।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के वित्तीय सहयोग से आईआईटी खड़गपुर के डॉक्टर बीसी रॉय मल्टी स्पेशियलिटी मेडिकल रिसर्च सेंटर के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर अरिष्ट लाहिड़ी और फाउंडेशन फॉर एक्शंस एंड इनोवेशंस टुवर्ड्स हेल्थ प्रमोशन के शोधकर्ता स्वीटी सुमन झा ने इस कार्य का नेतृत्व किया।
सलाहकार और मार्गदर्शक के रूप में फेथ की चेयरपर्सन और जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ मधुमिता दूबे, पुण्यब्रत दूबे तथा पश्चिम बंगाल पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रमुख चिकित्सक इंद्रनील सामंत जुड़े रहे। यह अध्ययन परिणामों के आधार पर नहीं बल्कि हाल ही में बीएमजे पब्लिक हेल्थ जर्नल में एक प्रोटोकॉल के रूप में प्रकाशित किया गया है।
खड़गपुर और कोलकाता के विभिन्न इलाकों में किए गए सर्वे में यह बात सामने आई कि एंटीबायोटिक का पूरा कोर्स करना, अपनी दवा दूसरों को न देना और नियमित हाथ धोने जैसी आदतों को लेकर जागरूकता काफी कम है। इसी को ध्यान में रखते हुए शोध दल ने जागरूकता शिविर, स्थानीय स्तर पर चर्चाएं और आशा कार्यकर्ताओं तथा अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को जोड़कर विशेष पहल शुरू की। अरिष्ट लाहिड़ी के नेतृत्व में स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण दिया गया ताकि वैज्ञानिक संदेशों को सरल और व्यवहारिक तरीके से लोगों तक पहुंचाया जा सके।
अध्ययन के तहत मानव शरीर, पर्यावरण और पशुजन्य खाद्य पदार्थों से कुल 417 नमूनों की जांच की गई। इनमें से लगभग 47.5 प्रतिशत नमूनों में बैक्टीरिया की मौजूदगी पाई गई। इन बैक्टीरिया में से 88.4 प्रतिशत नमूनों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और 81.3 प्रतिशत में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस पाया गया। हालांकि जिन इलाकों में यह सामाजिक पहल लागू की गई, वहां समय के साथ रेजिस्टेंट बैक्टीरिया की दर में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
एएमआर की रोकथाम में बच्चों और युवाओं की भागीदारी भी इस शोध का एक अहम पहलू रहा। स्वीटी सुमन झा के नेतृत्व में ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों में वन हेल्थ क्लब बनाए गए। इस पहल को ट्रिनिटी चैलेंज यूथ समिट लंदन और जिनेवा स्थित द साउथ सेंटर से आर्थिक सहयोग मिला। शोधकर्ताओं का मानना है कि मानव, पशु और पर्यावरण के समन्वित वन हेल्थ दृष्टिकोण से ही भविष्य में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से प्रभावी तरीके से निपटा जा सकता है।