एक नए अध्ययन के अनुसार, जो बुज़ुर्ग लोग शारीरिक रूप से कमजोर (फ्रेल) हैं और साथ ही डिप्रेशन से भी जूझ रहे हैं, उनमें डिमेंशिया का खतरा काफी अधिक हो सकता है। शोध में पाया गया कि ये दोनों कारण मिलकर डिमेंशिया के कुल खतरे का लगभग 17 प्रतिशत तक जिम्मेदार हो सकते हैं।
यह अध्ययन जनरल साइकियाट्री नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जहां कमजोरी और डिप्रेशन अलग-अलग भी डिमेंशिया का खतरा बढ़ाते हैं, वहीं अगर किसी व्यक्ति में दोनों समस्याएं एक साथ हों, तो उसे स्वस्थ लोगों की तुलना में तीन गुना से भी ज्यादा डिमेंशिया होने का खतरा हो सकता है। चीन के झेजियांग यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं के अनुसार, बुज़ुर्गों में कमजोरी और मानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच होनी चाहिए। अगर समय रहते शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुधारा जाए, तो डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है।
इस अध्ययन में अमेरिका और ब्रिटेन के दो लाख से अधिक लोगों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिसमें यूके बायोबैंक का डेटा भी शामिल था। करीब 13 साल के फॉलो-अप के दौरान 9,088 लोगों में डिमेंशिया का पता चला। अध्ययन में पाया गया कि जो लोग शारीरिक रूप से कमजोर थे,उनमें: महिलाएं अधिक थीं, जिनका वजन ज्यादा था, कई पुरानी बीमारियां थीं और शिक्षा का स्तर कम था। ऐसे लोगों में डिमेंशिया से पीड़ित होने की संभावना में 2.5 गुना अधिक थे। वहीं, डिप्रेशन से ग्रस्त लोगों में डिमेंशिया का खतरा करीब 60 प्रतिशत ज्यादा पाया गया।
जिन लोगों में कमजोरी और डिप्रेशन दोनों थे, उनमें डिमेंशिया का खतरा सबसे ज्यादा देखा गया। रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों समस्याओं के आपसी प्रभाव से डिमेंशिया के 17.1 प्रतिशत मामलों की व्याख्या की जा सकती है। टीम ने यह भी बताया कि अगर कमजोरी या डिप्रेशन में से किसी एक का स्तर कम हो, तो वह दूसरे के असर को कुछ हद तक कम कर सकता है। लेकिन जब दोनों ही समस्याएं एक तय सीमा से ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो शरीर की यह संतुलन बनाने की क्षमता टूट जाती है और डिमेंशिया का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।