बीजिंग : पश्चिम एशिया में जारी ईरान-अमेरिका तनाव का असर अब वैश्विक उद्योगों पर भी दिखाई देने लगा है। तेल और गैस के बाद अब सल्फ्यूरिक एसिड की आपूर्ति संकट में आ गई है। युद्ध की स्थिति और होरमुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर बढ़ती पाबंदियों के कारण कई देशों में इस महत्वपूर्ण रसायन की कमी महसूस की जा रही है।
होरमुज जलडमरूमध्य से दुनिया के अनेक देशों को बड़े पैमाने पर तेल, गैस और सल्फर भेजा जाता है लेकिन मौजूदा तनाव के कारण परिवहन बाधित हो रहा है। इसी बीच दुनिया का सबसे बड़ा सल्फर उत्पादक देश चीन भी सतर्क हो गया है। पश्चिम एशिया से सल्फर की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण चीन ने घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसका असर एशिया समेत कई देशों में देखने को मिल रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फ्यूरिक एसिड की कीमत तेजी से बढ़ रही है।
सल्फ्यूरिक एसिड का इस्तेमाल उर्वरक, धातु, कागज, कंप्यूटर चिप, बैटरी और सेमीकंडक्टर निर्माण में बड़े स्तर पर किया जाता है। इसके अलावा फॉस्फेट उर्वरक बनाने, तांबा और निकेल जैसे धातुओं को खदानों से निकालने और उन्हें शुद्ध करने, रबर उद्योग, चमड़ा उद्योग तथा पेयजल शुद्धिकरण में भी इसकी अहम भूमिका होती है।
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के इस फैसले का असर स्टील और भारी उद्योगों पर भी पड़ेगा। सल्फ्यूरिक एसिड इतना शक्तिशाली होता है कि यह स्टील को भी नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए हार्डवेयर उद्योग में इसका व्यापक उपयोग होता है। तेल और गैस शोधन के दौरान निकलने वाले सल्फर को जलाकर यह एसिड तैयार किया जाता है।
'वैलोर' के सह-संस्थापक कुणाल सिन्हा ने बताया कि सल्फ्यूरिक एसिड अत्यधिक ज्वलनशील होता है इसलिए इसका परिवहन काफी महंगा और कठिन होता है। इसे सुरक्षित रखने के लिए विशेष टैंकरों की जरूरत पड़ती है। अधिकांश उद्योग इसे केवल कुछ सप्ताह के लिए ही स्टोर करते हैं। ऐसे में होरमुज क्षेत्र में जारी अस्थिरता या किसी प्रकार की रुकावट का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट का सबसे ज्यादा असर चिली और इंडोनेशिया पर पड़ सकता है। तांबा उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में सल्फ्यूरिक एसिड की आवश्यकता होती है और चिली में तांबा उत्पादन पहले से प्रभावित होने लगा है। वहीं इंडोनेशिया में सल्फर की कीमतों में 80 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। निकेल का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों और स्टेनलेस स्टील उद्योग में होता है इसलिए कमी के कारण निकेल उत्पादन भी घटाया जा रहा है।
व्यापार विशेषज्ञ फ्रेडा गॉर्डन का कहना है कि चीन अपनी खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंतित है और वह चाहता है कि उर्वरकों की कीमतें अधिक न बढ़ें। इसी वजह से उसने सल्फर निर्यात पर नियंत्रण कड़ा किया है। हालांकि इसके कारण वैश्विक स्तर पर उर्वरक उत्पादन घट सकता है और खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही तांबा, निकेल, इलेक्ट्रिक वाहन और कंप्यूटर चिप निर्माण की लागत भी बढ़ने की आशंका है।
इस संकट के बीच अमेरिका और कनाडा जैसे देशों को फायदा मिल रहा है। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको से सल्फ्यूरिक एसिड आयात करता है जबकि उसके कई तेल शोधन संयंत्रों में भी सल्फर का उत्पादन होता है। कनाडा की इवानहो माइंस कंपनी वर्तमान में सल्फ्यूरिक एसिड की बिक्री से प्रतिदिन लगभग 10 लाख डॉलर, यानी भारतीय मुद्रा में करीब 8 करोड़ 60 लाख रुपये का लाभ कमा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सल्फ्यूरिक एसिड की आपूर्ति में कमी लंबे समय तक बनी रही तो उर्वरक, धातु, पेयजल और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों पर गंभीर असर पड़ सकता है।