लगभग दो महीने तक चले तनाव और वार्ताओं के बाद आखिरकार एक अंतिम शांति समझौता सामने आया है। हालांकि इस समझौते के बावजूद दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों की व्याख्या एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। एक ओर अमेरिका का कहना है कि यह समझौता सुरक्षा और परमाणु नियंत्रण के एक ढांचे से जुड़ा है जबकि दूसरी ओर ईरान इसे युद्धविराम, प्रतिबंधों की समाप्ति और संप्रभु अधिकारों की बहाली के समझौते के रूप में देख रहा है। साथ ही तेहरान का दावा है कि अंततः उसकी स्थिति मजबूत हुई है। मध्यस्थों के अनुसार लंबे तनाव और संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सहमति बनी है, लेकिन अब दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्याएँ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का प्रमुख विषय बन गई हैं।
एक समझौता, अलग-अलग दावे
अमेरिका का कहना है कि इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में तनाव कम करना और भविष्य में संघर्ष से बचते हुए स्थायी वार्ता की दिशा बनाना है। वॉशिंगटन इसे पूर्ण शांति समझौता नहीं मानता बल्कि इसे युद्ध रोकने और भविष्य की राजनीतिक एवं सुरक्षा वार्ताओं के लिए एक प्रारंभिक ढांचा मानता है। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत लाना और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना है।
इसके विपरीत तेहरान का रुख अलग है। ईरान का कहना है कि उसके लिए इस समझौते के केंद्र में आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना, जब्त संपत्तियों की वापसी, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से सामान्य रूप से चालू करना और भविष्य में हमलों की गारंटी शामिल है। ईरान का दावा है कि यह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि राजनीतिक और आर्थिक मान्यता का भी प्रश्न है। उसके अनुसार शांति के नाम पर उसके संप्रभु अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता और वह शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को बनाए रखेगा।
कहाँ-कहाँ मतभेद?
1. परमाणु कार्यक्रम
अमेरिका का रुख है कि ईरान को ऐसी प्रतिबद्धता देनी होगी जिससे वह भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में न बढ़े। हालांकि इस नियंत्रण की प्रकृति, अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणाली और कार्यान्वयन की समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है। ट्रम्प प्रशासन के अनुसार इस शर्त का अंतिम ढांचा अभी तय नहीं हुआ है।
ईरान का रुख— तेहरान खुले तौर पर कहता है कि वह अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को नहीं छोड़ेगा और प्रतिबंध हटाए बिना किसी बड़े समझौते को स्वीकार नहीं करेगा।
2. होर्मुज जलडमरूमध्य
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी दोनों देशों के विचार अलग हैं। अमेरिका चाहता है कि यहां निर्बाध नौवहन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचा सुनिश्चित हो। ईरान का कहना है कि सुरक्षा के साथ-साथ उसके भू-राजनीतिक हित भी सुरक्षित रहने चाहिए।
3. प्रतिबंध बनाम शर्तें
तेहरान की मांग है कि होर्मुज क्षेत्र में लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंध और आर्थिक पाबंदियों को जल्द से जल्द हटाया जाए। वॉशिंगटन का कहना है कि प्रतिबंधों में राहत चरणबद्ध तरीके से दी जाएगी और यह ईरान के वास्तविक कदमों पर निर्भर करेगा। इस कारण इस मुद्दे पर अभी तक स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई है।
4. युद्धविराम की अवधि
ड्राफ्ट ढांचे में 60 दिनों के युद्धविराम का उल्लेख सामने आया है। इस अवधि में आगे की वार्ता होनी है। लेकिन यह समयसीमा स्थायी शांति की गारंटी नहीं है बल्कि लंबे समय की बातचीत के लिए एक अवसर माना जा रहा है। इस मुद्दे पर भी दोनों देशों के अलग-अलग बयान से अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।
पाकिस्तान की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
इस वार्ता में पाकिस्तान का नाम एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में सामने आया है। कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार इस्लामाबाद ने दोनों पक्षों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान और प्रारंभिक ढांचे के निर्माण में भूमिका निभाई है। हालांकि तेहरान और वॉशिंगटन में से किसी ने भी आधिकारिक रूप से सभी विवरणों की पुष्टि नहीं की है।
क्या जटिलता अभी भी जारी है?
चूंकि दोनों देशों के राजनीतिक संदेश अलग-अलग है इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में एक ऐतिहासिक शांति समझौते की शुरुआत है या फिर केवल युद्ध रोकने के लिए एक अस्थायी राजनीतिक सहमति। अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों के अनुसार जब तक परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों की वापसी और क्षेत्रीय सुरक्षा पर स्पष्ट लिखित ढांचा तैयार नहीं होता तब तक इसे पूर्ण शांति समझौता कहना कठिन है।