इस्लामाबाद : पाकिस्तान में आर्थिक नीतियों और विकास योजनाओं को लेकर सरकार पर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक नेताओं, अर्थशास्त्रियों, ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक बड़े समूह ने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता और जबरन विस्थापन को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि मौजूदा हालात से आम लोगों में सरकार और व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ रही है।
पाकिस्तानी अखबार डॉन के अनुसार ये मुद्दे इस्लामाबाद के नेशनल प्रेस क्लब में अवामी वर्कर्स पार्टी-मार्क्सवादी (एडब्ल्यूपी-एम) की ओर से आयोजित एक गोलमेज बैठक में उठाए गए। बैठक में शामिल वक्ताओं ने आरोप लगाया कि देश की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का फायदा मुख्य रूप से प्रभावशाली वर्गों को मिल रहा है, जबकि मजदूर और कमजोर तबके के लोग लगातार पीछे छूट रहे हैं।
बैठक में इस्लामाबाद में अनौपचारिक बस्तियों को हटाए जाने की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की गई। वक्ताओं ने कहा कि राजधानी को बनाने और उसकी व्यवस्था चलाने में योगदान देने वाले हजारों कम आय वाले लोग अब बेदखली का सामना कर रहे हैं।
राजनीतिक अर्थशास्त्री डॉ. आसिम सज्जाद अख्तर ने कहा कि सरकार बड़े स्तर पर रियल एस्टेट परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है, लेकिन उन कामगारों को विस्थापित किया जा रहा है जो शहर की आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
देश के संघीय बजट को लेकर भी बैठक में गंभीर सवाल उठाए गए। नेशनल पार्टी पंजाब के अध्यक्ष अयूब मलिक ने कहा कि आर्थिक सुधारों और समायोजन का सबसे ज्यादा बोझ वेतनभोगी वर्ग पर डाला जा रहा है।
उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए रखे गए 8.2 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये से अधिक के प्रावधान का जिक्र करते हुए कहा कि इसका अंतिम भार आम नागरिकों को उठाना पड़ेगा। उन्होंने व्यापारियों और खुदरा कारोबारियों के लिए लागू निश्चित कर व्यवस्था की भी आलोचना की और दावा किया कि इससे प्रभावशाली कारोबारी समूहों को फायदा पहुंचता है, जबकि नौकरीपेशा लोगों पर भारी कर बोझ बना रहता है।
पूर्व सीनेटर फरहतुल्लाह बाबर ने राजनीतिक और सामाजिक असंतोष को दबाने के लिए सख्त तरीकों के इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ऐसे कदम पहले भी प्रभावी साबित नहीं हुए हैं। उन्होंने बढ़ती आर्थिक खाई का मुद्दा उठाते हुए कहा कि मौजूदा नीतियां गरीब समुदायों से संसाधनों को प्रभावशाली लोगों की ओर स्थानांतरित कर रही हैं।
अवामी वर्कर्स पार्टी की नेता आलिया अमीराली ने सवाल उठाया कि यदि कानूनों में बदलाव प्रभावशाली और अमीर वर्गों की जरूरतों के लिए किया जा सकता है, तो फिर कच्ची आबादियों में रहने वाले कमजोर लोगों की सुरक्षा के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जाता।
वहीं कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी (सीडीए) वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष इज्जत कमाल पाशा ने लंबे समय से मौजूद बस्तियों को अवैध घोषित करने के फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब झुग्गी प्रबंधन के लिए अलग व्यवस्था मौजूद है, तो फिर इन बस्तियों को हटाने का तर्क क्या है।
गोलमेज बैठक में लोकतांत्रिक अधिकारों के सीमित होने, असहमति की आवाजों पर रोक और कमजोर समुदायों के लिए आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं पर दबाव को लेकर भी चिंता जताई गई। प्रतिभागियों ने कहा कि आर्थिक और सामाजिक नीतियों में बदलाव के बिना देश में असमानता और लोगों की नाराजगी की स्थिति बनी रह सकती है।