नई दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 2.87 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड देने की मंजूरी दी है। शुक्रवार को रिजर्व बैंक के बोर्ड ने इस प्रस्ताव को स्वीकृति दी। यह राशि पिछले वर्ष की तुलना में 6.7 प्रतिशत अधिक है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में रिजर्व बैंक ने सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये का लाभांश दिया था।
रिजर्व बैंक ने बताया कि उसकी शुद्ध आय में 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जिसके कारण इस बार अधिक डिविडेंड देना संभव हो पाया। बैंक की नेट आय बढ़कर 3.96 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। हालांकि अधिक लाभांश देने के साथ-साथ आरबीआई ने अपने “कंटिनजेंसी रिस्क बफर” यानी सुरक्षा कोष में भी बड़ी राशि स्थानांतरित की है। इस मद में 1.09 लाख करोड़ रुपये रखे गए हैं जो एक साल पहले के 44,861 करोड़ रुपये की तुलना में लगभग 143 प्रतिशत अधिक है।
इसके बावजूद आरबीआई की बैलेंस शीट के मुकाबले इस सुरक्षा कोष का अनुपात घटकर 6.5 प्रतिशत रह गया है। पिछले वर्ष यह अनुपात 7 प्रतिशत था। इसकी मुख्य वजह पिछले एक वर्ष में रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट में 20.6 प्रतिशत की वृद्धि होना है। 31 मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार आरबीआई की कुल बैलेंस शीट 91,97,121.08 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
विशेषज्ञों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में वृद्धि, बॉन्ड और विदेशी मुद्रा बाजार में आरबीआई का हस्तक्षेप, तरलता प्रबंधन और बाजार में नकदी बढ़ने जैसे कई कारणों से बैलेंस शीट का आकार बढ़ा है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह डिविडेंड केंद्र सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से उर्वरक और रसोई गैस पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है। साथ ही कर संग्रह पर भी दबाव बनने की आशंका है।
केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में आरबीआई, बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों से कुल 3.16 लाख करोड़ रुपये डिविडेंड प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। पिछले वर्ष यह लक्ष्य 3.04 लाख करोड़ रुपये था।
इस बीच भारतीय स्टेट बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम पहले ही 14,000 करोड़ रुपये से अधिक का डिविडेंड देने की घोषणा कर चुके हैं। ऐसे में सरकार को अन्य वित्तीय संस्थानों से करीब 16,000 करोड़ रुपये और जुटाने होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि रिजर्व बैंक ने एक ओर अपने सुरक्षा कोष को मजबूत किया है, वहीं दूसरी ओर सरकार को बड़ी वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई है। मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच यह अतिरिक्त राशि सरकार के आर्थिक दबाव को कम करने में मददगार साबित हो सकती है।