नई दिल्ली : प्रदूषण शुल्क से भी ज्यादा भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहा है ऐसी टिप्पणी आईएमएफ की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने की। उनके अनुसार भारत के मामले में प्रदूषण का असर शुल्क या व्यापारिक बाधाओं की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है।
स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तहत आयोजित एक चर्चा सत्र में गीता गोपीनाथ ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रदूषण का प्रभाव, अब तक लगाए गए किसी भी शुल्क के प्रभाव से कहीं अधिक है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण का असर सिर्फ आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की जान भी ले रहा है।
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए गोपीनाथ ने कहा कि भारत में हर साल लगभग 17 लाख लोगों की मौत प्रदूषण के कारण होती है जो देश में कुल मौतों का करीब 18 प्रतिशत है। उनके शब्दों में प्रदूषण के कारण जीडीपी पर जो दबाव पड़ता है और लोगों की जान जाती है उसका पैमाना बहुत बड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदूषण भारत की निवेश आकर्षित करने की क्षमता को भी नुकसान पहुंचा रहा है। जब अंतरराष्ट्रीय निवेशक भारत में काम शुरू करने के बारे में सोचते हैं तो पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम एक बड़ी बाधा बनकर सामने आते हैं। बेहतर पर्यावरण न होने पर कई कंपनिया और पेशेवर भारत आने में रुचि नहीं दिखाते।
गोपीनाथ के मुताबिक दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं का समाधान बेहद जरूरी है। डीरिग्युलेशन या नीति सुधारों के साथ-साथ प्रदूषण नियंत्रण को मिशन मोड में लेने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए।
इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि भारत में व्यापार करना अब भी कठिन है। कई पुराने और जटिल नियम आर्थिक गतिविधियों में बाधा बन रहे हैं। भूमि और श्रम सुधार जैसे क्षेत्रों में बदलाव की जरूरत है ताकि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में सुधार हो सके। ये टिप्पणियां उन्होंने इंडिया टुडे द्वारा आयोजित एक पैनल चर्चा में की। इस चर्चा में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, उद्योगपति सुनील भारती मित्तल और आइकिया के सीईओ जुवेन्सियो मायस्तुए हेरेरा भी मौजूद थे।