नई दिल्ली : ‘एक्सेप्शन प्रूव्स द लॉ’ निश्चित ही सही है। लेकिन औसतन किसी फिल्म को हिट कराने का प्रचलित फॉर्मूला यही है कि पहले नायक हमेशा गरीब या साधारण लड़का होता है, जो देखने में बिल्कुल खास या परफेक्ट नहीं लगता। नायक इंटरवल से पहले विलेन या बहुत अमीर नायिका से किसी तरह का बड़ा झटका या अपमान सहता है। लेकिन फिल्म के दूसरे हिस्से में नायक पूरी तरह बदल जाता है और विजेता बनकर सामने आता है यानी किस्मत का बादशाह बन जाता है।
भारत का उत्पादन क्षेत्र भी मानो उसी फिल्म के फर्स्ट हाफ का हीरो है। जब-जब वह संभलकर खड़ा होने की कोशिश करता है सेवा क्षेत्र नाम का खलनायक आकर उसकी सफलताओं का श्रेय खुद ले जाता है। जिस ट्रेंड को बदलने की कोशिश में और देश के उत्पादन क्षेत्र को अतिरिक्त ऑक्सीजन देने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020 में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम लेकर आई थी। लेकिन नियम बहुत जटिल थे।
कोविड काल ठीक से खत्म भी नहीं हुआ था कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका की ओर से दबाव और चेतावनियों का दौर शुरू हो गया। इसके बाद मानो ताबूत में आखिरी और बड़ा कील ठोंकने जैसा असर पड़ा, यानी ट्रंप टैरिफ।
विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप कब, किस समय, कौन-सा फैसला लेंगे, किस देश पर और उसके किन उत्पादों पर भारी मात्रा में शुल्क लगा देंगे, यह बात व्हाइट हाउस के शीर्ष स्तर के अधिकारी भी पहले से ठीक-ठीक जानते हों, ऐसा कहना मुश्किल है।
वैसे भी बीते अप्रैल से अमेरिकी शुल्क बोझ के दबाव में भारतीय आयात-निर्यात की कमर लगभग टूटने की कगार पर है। बढ़ता व्यापार घाटा लगातार लाल बत्ती दिखा रहा है। ऐसे हालात में देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने इस बार बजट पेश करने की चुनौती आ खड़ी हुई है। जहां भारी अनिश्चितता के माहौल में खड़े होकर भी उन्हें पूरे शक्ति और दृढ़ता के साथ ‘मेक इन इंडिया’ के नारे से समुद्र से हिमालय तक और विश्व मानचित्र पर गूंज पैदा करनी होगी।
बाजार विशेषज्ञों के एक वर्ग का दावा है कि भारत-ईयू एफटीए पूरा हो जाने के बाद मौजूदा बजट ही निर्मला के सामने देश के उत्पादन क्षेत्र को सशक्त करने का आखिरी मौका है। नहीं तो विदेशी उत्पादों की भीड़ और कड़े टैक्सल के बीच उसका बचाव पूरी तरह टूट जाने की बड़ी संभावना है।
ऐसी स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था से वाकिफ हलकों का मानना है कि अमेरिकी शुल्क-तोप के मुकाबले के लिए मौजूदा बजट में निर्मला को ऐसी औद्योगिक रणनीति की रूपरेखा बनानी होगी। जिसमें पहले से कहीं अधिक जोर उत्पादित वस्तुओं के संभावित गंतव्यों को सुनिश्चित करने पर दिया जाए।
हालांकि निर्मला के लिए एकमात्र राहत की खबर यह है कि यूरोपीय संघ के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता संभव हो पाया है। यह समझौता बीते कुछ महीनों में ग्रेट ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ओमान के बाद केंद्रीय बजट पेश होने से पहले ही हुआ। इसकी वजह से आने वाले समय में दुनिया के कई बड़े बाजारों में भारतीय उत्पादों को शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलने वाला है। उस मांग के साथ कदम मिलाने के लिए रणनीतिक क्षेत्रों में और अधिक PLI योजनाएं शुरू करने की जरूरत है।
बाजार विशेषज्ञों के एक अन्य वर्ग का कहना है कि सिर्फ PLI से काम नहीं चलेगा। केंद्र को देश के आर एंड डी क्षेत्र को और मजबूत करने पर भी विचार करना होगा। उनके अनुसार देश की जीडीपी का महज 0.7% ही इस क्षेत्र में आवंटित होता है। कई प्रतिस्पर्धी देश अपनी जीडीपी का 2.5–3% इस पर खर्च करते हैं। साथ ही देश में आर एंड डी पर होने वाले कुल खर्च का केवल 36% सरकारी है जबकि कई विकासशील देशों में इस क्षेत्र में 70% तक खर्च सरकार की ओर से किया जाता है। इस पर भी निर्मला को ध्यान देना होगा।