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क्या मूल्यवृद्धि, रिटायरमेंट फंड की ताकत को धीरे-धीरे कमजोर कर देती है?

चाहे आप नौकरीपेशा हों या सेवानिवृत्त व्यक्ति, खर्च तो हमेशा रहेंगे। इन खर्चों को पूरा करने के लिए निवेश को इस तरह से व्यवस्थित करना चाहिए कि रिटायरमेंट के बाद आप अपनी खुद की कमाई और बचत के भरोसे जीवनयापन कर सकें। लिखते हैं : सुदीप्त तरफदार

By सुदीप्त तरफदार, Posted by : राखी मल्लिक

Jan 25, 2026 14:32 IST

नई दिल्ली : अभी वेतन का भरोसा है, यह ठीक है। लेकिन रिटायरमेंट के बाद तो मासिक वेतन यानी नियमित आय का प्रवाह कम हो जाएगा। उस समय सिर्फ जमा की गई रकम और उस पर मिलने वाला ब्याज ही सहारा होगा। उसी पैसे पर बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी-ब्याह का खर्च, बुढ़ापे में इलाज-दवाइयों का मासिक खर्च और न जाने कितनी छोटी-बड़ी जरूरतें निर्भर करेंगी। तब यह सब कैसे संभलेगा, यह सोचकर ही आज रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि मान लीजिए आपने जमा पूंजी को बैंक या पोस्ट ऑफिस की फिक्स्ड डिपॉजिट जैसी निश्चिंत जगह पर रख भी दिया। लेकिन वहां मिलने वाले बेहद कम ब्याज की दर पर हर महीने वेतन जितनी रकम निकालने के लिए कितनी बड़ी पूंजी चाहिए, इसका हिसाब लगाते ही ब्लड प्रेशर बढ़ना तय है। तब क्या होगा?

हर नौकरीपेशा वर्ग के लिए यह सचमुच एक बड़ी समस्या है। भले ही पहले भी लोगों को इसकी चिंता रहती थी लेकिन कुछ दशक पहले तक इससे निपटने के ज्यादा विकल्प नहीं थे। या तो बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट या फिर पोस्ट ऑफिस की बचत योजनाएं। लेकिन समय के साथ इन पारंपरिक निवेश साधनों पर मिलने वाला रिटर्न जिस स्तर पर पहुंच गया है उसमें सचमुच गुजारा मुश्किल हो गया है। इसी कारण अब लोग ज्यादा रिटर्न पाने के रास्तों पर गंभीरता से सोचने लगे हैं।

बचत को लेकर जागरूकता बढ़ने से कई लोग अब बैंक एफडी से हटकर अपनी निवेश राशि का बड़ा हिस्सा शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और सोना-चांदी जैसे मेटल्स में लगा रहे हैं। यह सच है कि ये निवेश पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं हैं। किसी भी समय मार्केट रिस्क आपके मूलधन को नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन जिन वर्षों में बाजार गिरता नहीं है, उन वर्षों में मिलने वाला अच्छा रिटर्न औसतन इस नुकसान की भरपाई कर देता है ऐसा निवेशकों को लगता है। हाल के वर्षों में जो रिटर्न मिला है उसे देखकर कभी-कभी पोर्टफोलियो खोलने पर मन को सुकून मिलता है। लगता है कि अगर यही सिलसिला कुछ साल और चला तो बुढ़ापे में कम से कम बच्चों पर बोझ नहीं बनना पड़ेगा।

इसी बचत को आदत बनाने के लिए नौकरीपेशा लोग ही नहीं, बल्कि दूसरे पेशों से जुड़े लोग भी अब सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी SIP का रास्ता अपना रहे हैं। एकमुश्त बड़ी रकम न लगाने से जेब पर ज्यादा असर भी नहीं पड़ता। साथ ही नियमित निवेश की आदत पड़ने से फोर्स्ड सेविंग होती रहती है और जमा पूंजी धीरे-धीरे बढ़ती जाती है।

इन शेयर और म्यूचुअल फंड जैसे निवेश साधनों में मिलने वाले रिटर्न को देखकर तो खुद की पीठ थपथपाने का मन करता है। कहीं 30%, कहीं 40% या उससे भी ज्यादा। पिछले साल तो सोना-चांदी ने भी शानदार प्रदर्शन किया। पूरे साल एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने आपके पोर्टफोलियो की चमक बढ़ा दी।

SIP शुरू करते समय आपके मन में एक गणना होती है। मान लीजिए आप हर महीने 10 हजार रुपये निवेश करते हैं और सालाना 12% रिटर्न मिलता है। ऐसे में 20 साल 1 महीने बाद सिर्फ 24 लाख 10 हजार रुपये निवेश करके भी आपका फंड बढ़कर करीब 1 करोड़ रुपये हो सकता है। अगर करोड़पति बनने का सपना और जल्दी पूरा करना हो, तो जाहिर है निवेश बढ़ाना पड़ेगा। मान लें आपने मासिक निवेश 25 हजार रुपये कर दिया। तब 12% रिटर्न पर साढ़े 13 साल में ही लक्ष्य हासिल हो सकता है। इसी दर से निवेश जारी रहा तो 10 करोड़ रुपये जुटाने में करीब 31 साल 2 महीने लगेंगे।

अगर आप थोड़े ज्यादा सजग निवेशक हैं तो हर साल वेतन बढ़ने के साथ-साथ निवेश भी बढ़ाने की कोशिश करेंगे। मान लीजिए आप हर साल SIP की राशि 10% बढ़ाते हैं। ऐसे में 25 हजार रुपये की SIP अगर 12% रिटर्न दे, तो 5 साल में करीब 20.27 लाख रुपये मिलते हैं जबकि कुल निवेश 15 लाख होता है। लेकिन अगर हर साल SIP 10% बढ़ाई जाए, तो 5 साल बाद आपको करीब 24.25 लाख रुपये मिल सकते हैं जबकि निवेश राशि 18.31 लाख होती है।

आप कह सकते हैं कि इतनी बड़ी रकम इतनी आसानी से भी जमा हो सकती है यह तो पता ही नहीं था! लेकिन असली बात यहीं छुपी है। आप अंतिम रकम देख रहे हैं, लेकिन बीच में मौजूद महंगाई यानी मूल्यवृद्धि का एवरेस्ट नजरअंदाज कर रहे हैं। रकम गलत नहीं है। तय समय बाद वह पैसा आपके पास होगा ही। लेकिन क्या आपने सोचा है कि आज उस पैसे से जो खरीदा जा सकता है, क्या भविष्य में भी वही खरीदा जा सकेगा?

सरल उदाहरण लें। पांच साल पहले चावल, तेल या सब्जियों के दाम जो थे, क्या आज वही हैं? बिल्कुल नहीं। अब सोचिए, दाम जितने बढ़े हैं, क्या आपकी आय भी उतनी ही बढ़ी है? कुल मिलाकर बात यह है कि पैसे की खरीदने की ताकत हर दिन घट रही है। आज 100 रुपये में जो मिलता है, अगले साल उतना नहीं मिलेगा। इसी को महंगाई या इंफ्लेशन कहते हैं। इसी को ध्यान में रखकर बचत शुरू करनी चाहिए।

मान लीजिए आपका वर्तमान सालाना खर्च 5 लाख रुपये है और रिटायरमेंट में अभी 20 साल बाकी हैं। अगर इस दौरान औसत महंगाई दर 3% भी रही, तो रिटायरमेंट के समय आपका सालाना खर्च करीब 9 लाख रुपये हो जाएगा। अगर महंगाई 5% या 6% रही, तो यही खर्च बढ़कर क्रमशः 13.27 लाख और 16 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। इसलिए या तो अभी से उसी हिसाब से बचत शुरू करें, या फिर यह भ्रम न पालें कि आप पर्याप्त बचत कर रहे हैं। जितना संभव हो, बचत बढ़ाएं और साथ ही खर्च की आदतों पर भी दोबारा सोचें।

एक और पेच है। मान लीजिए आप महंगाई को नजरअंदाज करके यह मान लेते हैं कि निवेश से सालाना 7.5% रिटर्न मिल जाएगा। अगर आपकी मौजूदा सालाना जरूरत 30 लाख रुपये है, तो 20 साल बाद भी उतनी ही क्रय-शक्ति बनाए रखने के लिए आपको करीब 3.29 करोड़ रुपये जमा करने होंगे। लेकिन अगर इसी अवधि में महंगाई 4% रही, तो वही क्रय-शक्ति बनाए रखने के लिए आपको करीब 4.46 करोड़ रुपये चाहिए होंगे, जो पहले अनुमान से 26% ज्यादा है। यह हिसाब पहले न लगाने से आप मुश्किल में पड़ सकते हैं।

ये गणनाएं भले ही जटिल लगें, लेकिन इतना समझ लेना जरूरी है कि बिना सही हिसाब के रिटायरमेंट के बाद पैसों की कमी तय है। आज की लापरवाही भविष्य में भारी बोझ बन सकती है। इसलिए जितनी भी बचत करें, वह हमेशा इंफ्लेशन-एडजस्टेड हिसाब से करें। अंधेरे में तीर चलाने से यह कहीं बेहतर है।

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