नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थिति के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ गया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। देश की ऊर्जा स्थिति, विशेषकर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) को लेकर केंद्र ने चिंता व्यक्त की है। इस परिस्थिति में देशभर में संभावित कमी से निपटने के लिए सरकार और सरकारी तेल कंपनियां वैकल्पिक रास्ते तलाश रही हैं।
इसके तहत तेजी से पाइप्ड गैस इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण, अधिक से अधिक पाइप्ड गैस का उपयोग और आवेदनों का शीघ्र निपटान जैसे कई उपाय शामिल हैं।
औद्योगिक सूत्रों के अनुसार सीमित भंडार को अधिक उपभोक्ताओं में बांटने के उद्देश्य से घरेलू गैस सिलेंडर का वजन कम करने पर भी विचार किया जा रहा है। वर्तमान में देश में इस्तेमाल होने वाले 14.2 किलोग्राम के गैस सिलेंडर के स्थान पर उसमें लगभग 10 किलोग्राम एलपीजी भरने का प्रस्ताव सामने आया है।
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो हर सिलेंडर में गैस कम होने के बावजूद यह औसतन लगभग एक महीने तक एक परिवार की जरूरत पूरी कर सकता है। आम तौर पर एक पूरा सिलेंडर 35 से 40 दिनों तक चलता है, उसकी तुलना में यह ‘हल्का’ सिलेंडर कुछ कम समय तक चलेगा, लेकिन व्यापक हित में इसे स्वीकृति दी जा सकती है।
इस बारे में सरकारी तेल विपणन कंपनी इंडियन ऑयल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वर्तमान स्थिति में एलपीजी आपूर्ति में कमी से बचने के लिए केंद्र कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। 14.2 किलोग्राम वाले रसोई गैस सिलेंडर में 10 किलोग्राम गैस भरकर बेचने की योजना उनमें से एक है।’
हालांकि, 14.2 किलोग्राम के सिलेंडर में 10 किलोग्राम गैस भरकर बेचने की बात को केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने खारिज कर दिया। उनके अनुसार यह संभावना पूरी तरह अटकलों पर आधारित है।
यदि यह संभावित बदलाव लागू होता है, तो सिलेंडर पर नया स्टिकर लगाया जाएगा, जिसमें कम वजन की जानकारी स्पष्ट रूप से दी जाएगी। साथ ही कीमत भी उसी अनुपात में कम की जा सकती है।
वर्तमान में कोलकाता में 14.2 किलोग्राम के एक पूर्ण सिलेंडर की कीमत लगभग 939 रुपये है। ऐसे में 10 किलोग्राम के सिलेंडर की कीमत उसी अनुपात में कम होने की संभावना है, जिससे उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में गैस बुकिंग के बाद कई जगहों पर तेल कंपनियां 10 किलोग्राम के प्लास्टिक सिलेंडर की डिलीवरी भी शुरू कर चुकी हैं। हालांकि इस योजना को लागू करना बिल्कुल आसान नहीं है।
तेल कंपनियों के अनुसार बॉटलिंग प्लांट्स में वजन मापने वाले उपकरणों को दोबारा कैलिब्रेट करना होगा। यहां तक कि विभिन्न नियामक एजेंसियों की मंजूरी भी आवश्यक हो सकती है। अचानक इस बदलाव को लागू करने से आम लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। यहां तक कि राजनीतिक स्तर पर भी इसके नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं, ऐसा भी माना जा रहा है।