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होर्मुज जलडमरूमध्य संकट से दुनिया में तेल आपूर्ति पर संकट गहराया, भंडार तेजी से घटे

वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ता तनाव, रिफाइनरी और आपूर्ति प्रणाली पर असर। कीमतों में उछाल और आर्थिक दबाव की आशंका।

नई दिल्लीः होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इस रणनीतिक मार्ग से होने वाली बाधित आवाजाही के कारण कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रणनीतिक भंडार पर निर्भर हो गए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता और अनिश्चितता तेजी से बढ़ी है। बाजार विश्लेषण संस्था मॉर्गन स्टेनली के अनुसार, मौजूदा हालात में दुनिया भर में प्रतिदिन लगभग 48 लाख बैरल कच्चे तेल की अतिरिक्त खपत भंडार से की जा रही है। 1 मार्च से 25 अप्रैल के बीच आपूर्ति में आई कमी के चलते देशों को अपने स्टॉक से अधिक मात्रा में तेल निकालना पड़ा है, जिससे वैश्विक भंडार पर दबाव बढ़ गया है। जेपी मॉर्गन चेज और इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के कई देशों में कच्चे तेल के भंडार में करीब 60 प्रतिशत और रिफाइंड फ्यूल में लगभग 40 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। यह स्तर पिछले कई वर्षों में सबसे निचले स्तरों के करीब माना जा रहा है।

कीमतों में तेजी और आर्थिक असर की आशंका

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति और अधिक बाधित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आने की संभावना है, जिसका सीधा असर महंगाई और आर्थिक स्थिरता पर पड़ेगा। कई देशों में तेल भंडार अब ऑपरेशनल न्यूनतम स्तर के करीब पहुंच चुके हैं। यदि आपूर्ति स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो जून तक “ऑपरेशनल स्ट्रेस लेवल” और सितंबर तक “ऑपरेशनल फ्लोर लेवल” तक पहुंचने का खतरा जताया जा रहा है, जो ऊर्जा ढांचे के लिए गंभीर स्थिति मानी जाती है।

भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चितता

होर्मुज क्षेत्र में जारी तनाव ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक विवाद से जुड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति के जल्द सामान्य होने की संभावना कम है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी और निवेश धारणा पर भी असर पड़ेगा। दुनिया के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता देश भी इस संकट से प्रभावित हैं। अमेरिका में कच्चे तेल और फ्यूल इन्वेंटरी लगातार घट रही है, जबकि स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व पर दबाव बना हुआ है। यूरोपीय देशों में भी जेट फ्यूल और डीजल की उपलब्धता सीमित हो रही है, जिससे ऊर्जा संकट और गहराता दिख रहा है।

एशिया में असंतुलित स्थिति

एशियाई देशों में स्थिति मिश्रित है। चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के पास अपेक्षाकृत मजबूत भंडार हैं, जबकि भारत, जापान और कुछ अन्य देशों में तेल भंडार 10 साल के मौसमी निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में युद्ध के बाद से तेल भंडार में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। भंडार तेजी से घट रहे हैं और आपूर्ति बाधाओं के चलते कीमतों में उतार-चढ़ाव की आशंका बनी हुई है। यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं होती, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा पर लंबे समय तक देखा जा सकता है।

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