नई दिल्ली: भारत में यूरोपीय संघ की 95 प्रतिशत से अधिक कंपनियां अगले पांच वर्षों में अपने कारोबार का विस्तार करने की योजना बना रही हैं। यह जानकारी फेडरेशन ऑफ यूरोपियन बिजनेस इन इंडिया (FEBI) के सर्वे में सामने आई है। इन कंपनियों ने विस्तार का मुख्य कारण भारत में बिक्री और बढ़ती बाजार की मांग बताया। सर्वे में यह भी बताया गया कि भारत में किए जाने वाले निवेश की राशि कंपनियों के स्तर पर काफी महत्वपूर्ण है।
लगभग 35 प्रतिशत कंपनियां अगले पांच सालों में 50 मिलियन यूरो या उससे अधिक निवेश करने की योजना बना रही हैं जो यह दर्शाता है कि निवेश का आधार व्यापक है, न कि कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित। सर्वे में यह भी सामने आया कि भारत यूरोपीय कंपनियों के लिए दिन-ब-दिन अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। 90 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि भारत उनके समग्र विकास का मुख्य चालक है। भारत के साथ-साथ तीसरे देशों को भी वे बिक्री बाजार, अनुसंधान और विकास केंद्र और उत्पादन का केंद्र मानती हैं।
सर्वे के परिणामों से यह भी स्पष्ट हुआ कि यूरोपीय कंपनियां भारत में अपनी प्रतिबद्धता को गहरा और व्यापक कर रही हैं। भारत और यूरोपीय संघ एक-दूसरे के लिए और अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं और मुक्त व्यापार समझौते का उत्साहपूर्वक इंतजार किया जा रहा है।
यूरोपीय कंपनियां भारत में कई क्षेत्रों में अवसरों को लेकर उत्साहित हैं। वे पारंपरिक क्षेत्रों जैसे निर्माण के साथ-साथ नई तकनीक और अत्याधुनिक क्षेत्रों जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक में अवसर देख रही हैं। सर्वे में सामने आया कि अधिकांश कंपनियां निर्माण और सप्लाई चेन में बढ़ते अवसर तथा भारत में और भारत से बाजार विस्तार की संभावना तलाश रही हैं। कुछ कंपनियां AI और डिजिटल नवाचार में निवेश करना चाहती हैं। कुछ सस्टेनेबिलिटी में और कुछ R&D में निवेश करना चाहती हैं। कई कंपनियों ने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर में निवेश के लिए भी धन रखा है। इसके अलावा कुछ कंपनियां भारत में सप्लाई चेन और सोर्सिंग को मजबूत करने के लिए भी प्रयत्नशील हैं।
सर्वे में यह भी सामने आया कि भारत की राजनीतिक स्थिरता, कुशल मानव संसाधन और किफायती निर्माण लागत यूरोपीय कंपनियों के लिए आकर्षक हैं। इसके अलावा, भू-राजनीतिक बदलाव भी भारत के पक्ष में हैं। राज्य सरकारें जो सक्रिय हैं, उन्हें अतिरिक्त यूरोपीय FDI आकर्षित करने में सबसे अच्छी स्थिति में रहने का मौका मिलेगा।
यूरोपीय कंपनियों ने यह भी सुझाव दिया कि भारत को कुछ क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में अब भी कुछ चुनौतियां हैं और यदि केंद्र और राज्य सरकारें इन पर ध्यान दें, तो यूरोपीय निवेश और बढ़ सकता है। अधिकांश कंपनियों ने कहा कि नियम और मंजूरी प्रक्रिया कठिनाई पैदा करती है। कस्टम और आयात नियम जटिल हैं, कर प्रणाली अस्पष्ट है, स्थानीय सामग्री आवश्यकताएं समय पर नहीं हैं और गुणवत्ता नियंत्रण आदेश चुनौतीपूर्ण हैं। यूरोपीय कंपनियां भारत में अधिक निर्माण सुविधाओं में निवेश करना चाहती हैं, लेकिन स्थानीय सामग्री नियमों के कारण उन्हें कठिनाई हो रही है।
सर्वे के बाद भारत और यूरोपीय संघ ने मंगलवार को ऐतिहासिक इंडिया-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को सफलतापूर्वक अंतिम रूप दिया। FTA के दस्तावेज EU ट्रेड कमिश्नर मारोस सेफकोविक और केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बीच आदान-प्रदान किए गए। यह घोषणा भारत-यूरोप आर्थिक संबंधों और वैश्विक साझेदारों के साथ व्यापार संबंधों में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। संयुक्त बयान के अनुसार यह समझौता India-EU रणनीतिक साझेदारी में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को बढ़ाएगा, साझा समृद्धि को बढ़ावा देगा, मजबूत और विविध सप्लाई चेन तैयार करेगा और टिकाऊ और समावेशी विकास का समर्थन करेगा।
यह FTA 2022 में फिर से शुरू हुई कड़ी बातचीत के बाद हुआ है। यूरोपीय संघ भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। माल और सेवा व्यापार दोनों में वर्षों से स्थिर वृद्धि हुई है। 2024-25 में भारत और EU के बीच माल का व्यापार 11.5 लाख करोड़ रुपये (136.54 बिलियन डॉलर) रहा, जिसमें भारत का निर्यात 6.4 लाख करोड़ रुपये (75.85 बिलियन डॉलर) और आयात 5.1 लाख करोड़ रुपये (60.68 बिलियन डॉलर) था। भारत और EU के बीच सेवा व्यापार 7.2 लाख करोड़ रुपये (83.10 बिलियन डॉलर) तक पहुंच गया।